Thursday, August 4, 2016

नम हुई जाती है तुम्हारी पलकें...........दिनेश नायडू


फिर घटा ज़हन के आकाश में छाई हुई है
मेरे चौखट प कोई नज़्म सी आई हुई है

लौट आईं हैं गए दिन की सदायें मुझमें
भीगती कांपती इक शाम भी आई हुई है

ऐसी शामों में तुझे याद तो आता होगा
ये घडी हमने कभी साथ बिताई हुई है

ये सड़क रात के आगोश में सिमटी हुई आज
मुझसे कहती है क्यों उम्मीद लगाई हुई है

जानता हूँ मैं इस आवाज़ के नक़्शे पूरे
तेरी आहट प कई रोज़ पढ़ाई हुई है

किसलिए नम हुई जाती है तुम्हारी पलकें
ये कहानी तो तुम्हे मैंने सुनाई हुई है

दिनेश नायडू
09303985412

1 comment:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (08-08-2016) को "तिरंगा बना देंगे हम चाँद-तारा" (चर्चा अंक-2428) पर भी होगी।
    --
    मित्रतादिवस और नाग पञ्चमी की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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