Tuesday, June 7, 2016

क्यूँकि लाखों हैं यहाँ स्वाँग रचाने वाले.....कुँवर कुसुमेश


फिक्र बिलकुल न करें आग बुझाने वाले। 
पानी पानी हैं सभी आग लगाने वाले।

मुझको अहसासे-मुहब्बत पे गुमाँ है लेकिन,
उनको अहसास करा देंगे कराने वाले।

सिर्फ दिखते हुए दाँतों से हमें क्या लेना,
दाँत हाथी के अलग होते है खाने वाले।

कैसे पहचाने कोई आज किसी इंसाँ को,
क्यूँकि लाखों हैं यहाँ स्वाँग रचाने वाले।

वक़्त आने पे मुकर जाते हैं यूँ तो लाखों,
फिर भी देखे हैं कई फ़र्ज़ निभाने वाले।

प्यार के नाम पे लुट जाना हमारी फितरत,
प्यार में हम है "कुँवर" जान लुटाने वाले।

-कुँवर कुसुमेश

8 comments:

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  2. वक़्त आने पे मुकर जाते हैं यूँ तो लाखों,
    फिर भी देखे हैं कई फ़र्ज़ निभाने वाले।

    बहुत खूब कुसुमेश जी , मंगलकामनाएं आपको.....

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  3. वाह, बहुत सुन्दर

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  4. waah saab ji bahut acchi shyaries likhte ho kripya aap mujhe high rank ka tarika bata sakte hain humara blog hai www.bhannaat.com

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