Thursday, November 27, 2014

आग ठंडी हुई इक ज़माने के बाद..........खुमार बाराबंकवी




वो सवा याद आये भुलाने के बाद
जिंदगी बढ़ गई ज़हर खाने के बाद

दिल सुलगता रहा आशियाने के बाद
आग ठंडी हुई इक ज़माने के बाद

रौशनी के लिए घर जलाना पडा
कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बाद

जब न कुछ बन पड़ा अर्जे-ग़म का जबाब
वो खफ़ा हो गए मुस्कुराने के बाद

दुश्मनों से पशेमान होना पड़ा है
दोस्तों का खुलूस आज़माने के बाद

बख़्श दे या रब अहले-हवस को बहिश्त
मुझ को क्या चाहिए तुम को पाने के बाद

कैसे-कैसे गिले याद आए "खुमार"
उन के आने से क़ब्ल उन के जाने के बाद

-खुमार बाराबंकवी

8 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.11.2014) को "लड़ रहे यारो" (चर्चा अंक-1811)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  2. ..बहुत बढ़िया प्रस्तुति !

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  3. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल...

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  4. दिल को छू गई आपकी रचना

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  5. सुन्दर प्रस्तुति...

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