Sunday, January 12, 2014

'फ़लसफ़ा प्रकृति का'..................शोभा रतूड़ी



बहारों में शाखों के पत्ते,
साँसों को रखते जवाँ,....
पतझर में झरते पत्ते,
ढलते मौसम को
करते बयाँ……!

मुरझाती टहनी का
एक पीला पत्ता....
जिंदगी की बगिया से
दरकिनार होता....
मौसम-ए-पतझर में
कैसे गुलज़ार रहता ?

ढलती हुई साँझ का
यही है.... फ़लसफ़ा....
दिए की टिमटिमाती लौ से
जैसे छँटता....
शाम का धुँधलका…! 



-शोभा रतूड़ी

8 comments:

  1. वाह बहुत सुंदर.....

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  2. काफी उम्दा प्रस्तुति.....
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (14-01-2014) को "मकर संक्रांति...मंगलवारीय चर्चा मंच....चर्चा अंक:1492" पर भी रहेगी...!!!
    - मिश्रा राहुल

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  3. सुन्दर अनुभूति की अभिव्यक्ति !
    मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएं !
    नई पोस्ट हम तुम.....,पानी का बूंद !
    नई पोस्ट बोलती तस्वीरें !

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  4. ढलती हुई साँझ का
    यही है.... फ़लसफ़ा....
    दिए की टिमटिमाती लौ से
    जैसे छँटता....
    शाम का धुँधलका…!
    ..बहुत सही कहा आपने ..यही दस्तूर है ...
    मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएं !

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