Wednesday, February 14, 2018

नदी को सागर मिला नहीं है.....निर्मला कपिला

गिला-औ-शिकवा रहा नहीं है
मलाल फिर भी गया नहीं है

तलाश उसकी हुई न पूरी
नदी को सागर मिला नहीं है

बुला के मुझको किया जो रुसवा
ये बज़्म की तो अदा नहीं है

ये तो मुहब्बत लगी अलामत
अलील दिल की दवा नहीं है

गुलों के जैसे जिओ खुशी से
के ज़िंदगी का पता नहीं है

ग़रूर दौलत प किस लिए हो
ये धन किसी का सगा नहीं है

शरर ये नफरत का किसने फेंका
जो आज तक भी बुझा नहीं है

किसी को शीशा दिखा रहा जो
वो दूध का खुद धुला नहीं है

उलाहना दूं उसे जो निर्मल
यही तो मुझसे हुया नहीं है

- निर्मला कपिला

Tuesday, February 13, 2018

एक नन्ही सी नाजुक-नर्म कविता .....स्मृति आदित्य


रोज ही 
एक नन्ही सी 
नाजुक-नर्म कविता 
सिमटती-सिकुड़ती है 
मेरी अंजुरि में..
खिल उठना चाहती है 
किसी कली की तरह...
शर्मा उठती है 
आसपास मंडराते 
अर्थों और भावों से..
शब्दों की आकर्षक अंगुलियां 
आमंत्रण देती है 
बाहर आ जाने का. ..
नहीं आ पाती है 
मुरझा जाती है फिर 
उस पसीने में, 
जो बंद मुट्ठी में 
तब निकलता है 
जब जरा भी फुरसत नहीं होती 
कविता को खुली बयार में लाने की...
कविता.... 
लौट जाती है 
अगले दिन 
फिर आने के लिए... 
बस एक क्षण 
केसर-चंदन सा महकाने के लिए....
-स्मृति आदित्य

Monday, February 12, 2018

स्याही से नहीं रुहानी लिखना.....कुसुम कोठारी

कोरे पन्ने पे कोरी कहानी लिखना
स्याही से नहीं रुहानी लिखना 

उछल के समंदर से जो आया वो पानी लिखना
उस रुके पानी में फिर रवानी लिखना

किताबों मे जो गुलाब थे वो निशानी लिखना
उन सुखे फूलों की खुशबू  सुहानी लिखना

क्षितिज पर मिलते धरती आसमान लिखना
मन आकाश को छूती गजल सुहानी लिखना ।

-कुसुम कोठारी 

Sunday, February 11, 2018

जाने क्यूँ !!!...................सदा


शब्दों की चहलकदमी से
आहटें आती रहीं
सन्नाटे को चीरता
एक शोर
कह जाता कितना कुछ
मौन ही !
बिल्कुल वैसे ही
मेरी खामोशियाँ आज भी
तुमसे बाते करती हैं
पर ज़बां ने खा रखा है
चुप्पी का नमक
कुछ भी कहने से
इंकार है इसे
जाने क्यूँ !!! 

-सीमा सदा सिंघल
......फेसबुक से

Saturday, February 10, 2018

वो उग आये................ शंकर सिंह परगाई


उग आते हैं 
तुम्हारे मन–मस्तिष्क के 
उन गीले 
कोनों पर 
जहाँ भी 
हल्की-सी सीलन है। 

वहाँ पनप जाते है वो  
तुम्हारे भीतर 
तब तुम्हें 
उनकी ही तरह 
सही लगता है 
किसी एक रंग को ही 
सारे रंगो से फीका कहना। 

गुमान लगता है तुम्हें 
भूखे पेट भी 
मंदिर मस्जिद का
नारा लगाना।

नही चुभते है तब तुम्हारे  
कोमल हृदय में 
कैक्टस के सख़्त काँटे भी 
आख़िर जगह दी थी 
तुमने ही..।

वो उग आये  
मन–मस्तिष्क के 
गीले कोनों पर 
जहाँ हल्की-सी भी 
सीलन रहती रही। 

- शंकर सिंह परगाई

Friday, February 9, 2018

गुफ़्तगू इससे भी करा कीजे.....नीरज गोस्वामी

गुफ़्तगू इससे भी करा कीजे
दोस्त है दिल ना यूँ डरा कीजे

दर्द सह कर के मुस्कुराना है
आप घबरा के मत मरा कीजे 

जब सकूँ सा कभी लगे दिल में
तब दबी चोट को हरा कीजे 

याद आना है ख़ूब आओ मगर
मेरी आँखों से ना झरा कीजे 

क्या है इन्साफ़ बस सजाऐं ही
कभी खोटे को भी खरा कीजे 

नहीं आसान थामना फिर भी
हाथ उसकी तरफ जरा कीजे 

वो है खुशबू ये जान लो नीरज
उसको साँसों में बस भरा कीजे 
-नीरज गोस्वामी

Thursday, February 8, 2018

पागल मन....लक्ष्मीनारायण गुप्त


शराब है, मस्ती है, बेफ़िक्री है
मगर साकी नहीं पास है
बिन साकी के शराब पीने में
न मज़ा है, न हुलास है

साकी को देखा तो नीयत बदल गई
क्या कहूँ मेरी तक़दीर बिगड़ गई
साकी को यह बात बताऊँ कैसे
ना सुनने की हिम्मत मैं कर पाऊँ कैसे


पागल मन की बात बताऊं कैसे
नामुमकिन को मुमकिन कर पाऊँ कैसे
तू ही बता तुझे मैं पाऊँ कैसे
दीवाने दिल की प्यास बुझाऊँ कैसे

नहीं बताने की हिम्मत है मुझमें
पर नज़र मिलाना चाहूँगा मैं तुझसे
किस अदा से तू शराब ढालती प्याले में
मज़ा आगया तुझसे नज़र मिल जाने में

पागल मन को समझाता हूँ
पाने की उम्मीद छोड़, तू हारा
नज़र मिल गई, क़िस्मत अच्छी
क्या यह कम है यारा

-लक्ष्मीनारायण गुप्त