Sunday, January 12, 2014

'फ़लसफ़ा प्रकृति का'..................शोभा रतूड़ी



बहारों में शाखों के पत्ते,
साँसों को रखते जवाँ,....
पतझर में झरते पत्ते,
ढलते मौसम को
करते बयाँ……!

मुरझाती टहनी का
एक पीला पत्ता....
जिंदगी की बगिया से
दरकिनार होता....
मौसम-ए-पतझर में
कैसे गुलज़ार रहता ?

ढलती हुई साँझ का
यही है.... फ़लसफ़ा....
दिए की टिमटिमाती लौ से
जैसे छँटता....
शाम का धुँधलका…! 



-शोभा रतूड़ी

Saturday, January 11, 2014

किसी ने तेज़ाब सा ज़हर डाला……….....रिंकी राउत


सर झुकए सब से नज़रे छुपाए
वो चले जा रही अपनी राह
सर का आँचल
चेहरा का नकाब
सब को संभाले
वो चली जा रही अपने राह

कुछ ने कहा वहीं है ये
इसी की कोई गलती होगी
कोई ऐसे ही नहीं डालेगा
तेज़ाब

लोगो की बातोँ की जलन ने
उसके अंदर के साहस को जलाया
उसे लगा एक बार फिर उस पर
किसी ने तेज़ाब सा ज़हर डाला

तेज़ाब से चेहरा जले तो एक बात
सपने,हौसले,रिश्ते इज़्जत तक
जल जाता है

तेज़ाब ने उसकी चमड़ी नहीं,
जिंदगी जला डाली
जलने का निशान गहरे ,
आत्मा तक पड़ गया

घुटन, बेबसी की एक काली जिंदगी
साथ लिए वो जी रही थी
आज वो चल पड़ी
मिटाने शरीर, आत्मा पर पड़े निशान
चल पड़ी अपने सम्मान, मान,
खोई जिन्दगी के लिए 

मंजिल की तलाश में

ताने दे चाहे कोई या 

खड़ा हो जाए राह में
तेज़ाब के जलन को छोड़ कर
आज निकल चली
नए असमान की तलाश में.
एक नए असमान की तलाश में………..


-रिंकी राउत

हर दहलीज़ दर्द कई समेटे होता है..............आशा गुप्ता 'आशु'



अब तुम कहते हो तो
सब सुनती हूँ बस सुनती हूं
उसी तरह जैसे पत्थरों पर गिरती है बूंदे
और सरक कर परे हो जाती हैं





एक आकार जो ...
अब बदलता ही नहीं
नहीं गढ़ता कोई मूरत और न कहानियां
ना कोई संवेदन और ना ही कोई आहट
तुमने अपने लिए अब
कितने नाम चुन लिए हैं
नादानी, बेवकूफी, पागलपन
और भी ना जाने क्या -क्या
और शब्द सिर्फ एक 'माफी'
समझदारी का ताज़ पहनाये
जो तुमने मुझे
कभी उसके पीछे की
कसमसाहट भी देखी होती
और जाना होता कि
हर चुप हज़ार दास्तानों में कैद होता है
हर दहलीज़ दर्द कई समेटे होता है
सुना तुमने....सुना श्वेताम्बरा ने.... ...


-आशा गुप्ता 'आशु'

मेरी नई फेसबुक मित्र
मेरी नई सखी....

Wednesday, January 8, 2014

तो इस पे बोसों की हम झालरें लगा देते............नवीन सी. चतुर्वेदी

 
तुम अपना चेहरा जो इन हाथों को थमा देते
तो इस पे बोसों की हम झालरें लगा देते

पलट के देखने भर से तो जी नहीं भरता
ये और करते कि थोड़ा सा मुस्कुरा देते

ये चाँद क्या है सितारे हैं क्या, जो कहते तुम
तुम्हारे क़दमों में हम कहकशां बिछा देते

तुम्हारे साथ उतर जाते हम भी बचपन में
तुम इस बदन को ज़रा सा जो गुदगुदा देते

तुम्हारे साथ रहे, ग़म मिला, ख़ुशी बाँटी
बस अपने साथ ही रहते तो सब को क्या देते

कहा तो होता कि तुम धूप से परेशां हो
हम अपने आप को दुपहर में ही डुबा देते

यहाँ उजालों ने आने से कर दिया था मना
वगरना किसलिये शोलों को हम हवा देते

हमारा सूर्य न होना हमारे हक़ में रहा
न जाने कितने परिंदों के पर जला देते

- नवीन सी. चतुर्वेदी
http://wp.me/p2hxFs-1Bi

Monday, January 6, 2014

कई फूलों से चेहरे आ गये मेरी इबादत में...............दिनेश नायडू


मैं अपने दिल में तेरी याद का सैलाब रखता हूँ
और इस तलवार से पर्वत का सीना चीर सकता हूँ

कई फूलों से चेहरे आ गये मेरी इबादत में
निगाहों में बहारों का मैं वो एहसास रखता हूँ

तिरी आँखों की गहराई का अंदाज़ा न था मुझको
मगर ये शक़ तो था शायद कभी मैं डूब सकता हूँ

मुझे ख़ामोशियों में ज़िन्दगी जीनी पड़ेगी अब
मैं इस दरजा किसी भी बात को कहने से डरता हूँ

तिरे जाने से क्या बदला मिरी दुनिया में मेरी जाँ
उसी शिद्दत से तुझको रोज़ मैं महसूस करता हूँ

हमेशा फ़ोन करके पूछता हूँ ” कैसी हो तुम अब “
वही इक बात सुन कर बोलता हूँ ” अब मैं रखता हूँ “

तुम अपने फ़ैसले को ठीक अब भी मानती हो क्या
मिरा क्या है कि मैं इस आग में हर रोज़ जलता हूँ

भरी है डायरी मेरी फ़क़त तेरी कहानी से
अक़ीदत से तिरी यादों को मैं हर रोज़ पढता हूँ

तिरी तस्वीर सीने से लगा रक्खी है, सिगरट है
यही वो ढंग है जिससे तुझे मैं दूर रखता हूँ

सवालों का यही उत्तर है दिल के पास मुद्दत से
बहुत अच्छा हूँ दीवाने धड़कना था धड़कता हूँ

सदा मेरी मुझी तक आ नहीं पायी मगर जानां
न जाने क्यूँ मुझे लगता है मैं भी चीख़ सकता हूँ

किया जिसने भी अपनी ज़िन्दगी को आशिक़ी के नाम
मैं उस हर एक शायर की किताबों में महकता हूँ

मुझे रिश्तों के भोलेपन पे इस दरजा भरोसा है
कोई गर बात इनकी छेड़ दे तो चुप ही रहता हूँ

तेरी गलियों के चुम्बक से ये मेरे पाँव चिपके हैं
मुझे कैसे भरोसा हो कि हाँ मैं चल भी सकता हूँ

दिनेश नायडू 09303985412

Sunday, January 5, 2014

ज़रा सा हक़ जताना चाहता हूँ............प्रखर मालवीय`कान्हा’


ख़ला को छू के आना चाहता हूँ
मैं ख़ुद को आज़माना चाहता हूँ

मेरी ख़्वाहिश तुझे पाना नहीं है
ज़रा सा हक़ जताना चाहता हूँ

तुझे ये जान कर हैरत तो होगी
मैं अब भी मुस्कुराना चाहता हूँ

तेरे हंसने की इक आवाज़ सुन कर
तेरी महफ़िल में आना चाहता हूँ

मेरी ख़ामोशियों की बात सुन लो
ख़मोशी से बताना चाहता हूँ

बहुत तब्दीलियाँ करनी हैं ख़ुद में
नया किरदार पाना चाहता हूं.....!!
-प्रखर मालवीय`कान्हा’

Friday, January 3, 2014

ख़ौफ़ दिल से उतर गया होता.............आलोक मिश्रा



सर से पानी गुज़र गया होता
ख़ौफ़ दिल से उतर गया होता

तू जो मुझको न भूल पता गर
तू भी मुझसा बिखर गया होता

आजिज़ी कितने काम आती है
सर उठाता तो सर गया होता

मुंतज़िर मेरा जो होता कोई
लौटकर मैं भी घर गया होता

ज़िंदगी हिज्र की बुरी है बहुत
इससे बेहतर था मर गया होता

आलोक मिश्रा 09876789610

 http://wp.me/p2hxFs-1AW