Tuesday, September 10, 2013

बस नाम का ही भाग्य विधाता है आईना.................... डॉ. कुंवर बेचैन



अपनी सियाह पीठ छुपाता है आईना
सबको हमारे दाग दिखाता है आईना

इसका न कोई दीन, न ईमान ना धरम
इस हाथ से उस हाथ में जाता है आईना

खाई ज़रा-सी चोट तो टुकड़ों में बँट गया
हमको भी अपनी शक्ल में लाता है आईना

हम टूट भी गए तो ये बोला न एक बार
जब ख़ुद गिरा तो शोर मचाता है आईना

शिकवा नहीं कि क्यों ये कहीं डगमगा गया
शिकवा तो ये है अक्स हिलाता है आईना

हर पल नहा रहा है हमारे ही ख़ून से
पानी से अब कहाँ ये नहाता है आईना

सजने के वक़्त भी ये हमें दे गया खरोंच
बस नाम का ही भाग्य विधाता है आईना 

-डॉ. कुंवर बेचैन

Monday, September 9, 2013

मुहब्बत, तेरी खुशबू, चांदनी है, जाफरानी है...........डॉ. कुंवर बेचैन


न तो किरदार है कोई न राजा है न रानी है
मैं इक कोरा-सा कागज हूँ अजब मेरी कहनी है

मुहब्बत करने वाले,प्यार को दिल में रखे रखना
ख़ुदा ने जो  हमे बख़्शी है ये ऐसी निशानी है

जो दिन में चांद बनकर चांदनी देती रही मुझको
मुहब्बत, तेरी खुशबू, चांदनी है, जाफरानी है

घिरी है अब भी लपटों में, दिखाई कुछ नहीं देता
ये मेरी जिन्दगी है या धुंएँ की राजधानी है

शुरू से अंत तक कहती रही दुनियां में रहने दो
मगर कब मौत ने इस जिन्दगी की बात मानी है

नहीं तो कुछ दिनों में वो भी रेगिस्तान बन जाती
ये अच्छा ही हुआ अब तक मेरी आँखों में पानी है

अभी कर जिसके मैंनें अपनी आँखो से नहीं देखा
' कुंवर' मैंनें उसी के साथ मर-मिटने की ठानी है

-डॉ. कुंवर बेचैन
 
 

Sunday, September 8, 2013

रानी तक गर है राजा की, राजा तक रानी की हद....डॉ. कुंवर बेचैन



आंधी तक है तेज हवा की, बाढ़ों तक पानी की हद
पर राजाओं ने कब तय की, अपनी मनमानी की हद

मेहमानों का आदर करना,अच्छा है लेकिन यारों
मेहमां घर को ही ले बैठे. ये है मेहमानी की हद

याचक जो भी चाहे, उसके क्या वो ही दे देंगे हम
दानी से कहियेगा, कुछ तो होती है दानी की हद

सैलानी बनकर आए हो, क्या तुमको मालूम नहीं
औरों के घर में होती है, कुछ तो सैलानी की हद

ये तो है अन्याय, कि महलों को तो पूरी छूट मिले
और इधर तय कर दी जाए, हर छप्पर-छानी की हद

उत्तर में वो यह कह देंगे, अपनी सीमा कोई नहीं
परधानों से पूछ के देखो, उनकी परधानी की हद

उसके आगे खुशियां भी होंगी, मुझके मालूम नहीं
बस यह जाना, चिंता तक है, मेरी पेशानी की हद

हम तो अन्न उगाकर भी भूखे हैं, अब तुम बतलाओ
कुछ तो होगी, यार तुम्हारी भी तो हैरानी की हद

उसके बाद तो, कड़वाहट ही कड़वाहट है जीवन में
शायद बचपन तक ही है, ये मीठी गुड़धानी की हद

उसके राज में, जनता तो भूखी-प्यासी मरनी ही है
रानी तक गर है राजा की, राजा तक रानी की हद

डॉ. कुंवर बेचैन
जन्मः 01 जुलाई 1942, मुरादाबाद उ.प्र.
सौजन्यः रसरंग, दैनिक भास्कर

Saturday, September 7, 2013

बदनाम हुआ क्यों नाम 'संत'..............डॉ. रामकृष्ण सिंगी



क्यों गूंज रहे हैं दिग-दिगंत।
क्यों उछल रहे मुद्दे अनंत।।
बदनाम हुआ क्यों नाम 'संत'।
कब होगा पाखंडों का अंत ।।1।।
जरा सोचो तो!


राजनीति-धर्म की घाल-मेल ।
बरसती लक्ष्मी के घिनौने खेल।।
नैतिकता हुई शोबाजों की रखैल।
आमजन उदार, सब रहा झेल ।।2।।
जरा सोचो तो!


इक्कीसवीं सदी में भी (घोर) अंधविश्वास ।
शास्त्रों को मिला अज्ञातवास।।
श्रद्धाएं छुपी मन्नतों के आसपास।
नई पीढ़ी को लगने लगा सब बकवास ।।3।।
जरा सोचो तो!


श्रद्धा सीता का हो रहा हरण।
निष्ठा की द्रोपदी चीख रही।।
(राम गये हैं स्वर्ण-मृग के पीछे।)
पांडव बैठे कर नयन नीचे ।।)
कोई तो बचाओ रे इनको।
रक्षा की मांग ये भीख रहीं ।।4।।
जरा सोचो तो!


या कह दो सब बीमार हैं हम।
चुप रह कर हिस्सेदार हैं हम।।
जो रोता है उसे रोने दो।
ये भव्य तमाशे होने दो।।
श्रद्धा को पाखंड खा जायेगा।
तो कौन सा प्रलय आ जायेगा ।।5।। 
क्या यही सोच है ?


गर तंत्र-मंत्र का पाखंडी।
कोहरा यों ही गहरायेगा।।
(भोली) अबलाओं का यो ही शोषण होगा
और धर्म रसातल जाएगा ।।6।।


(पर) न्याय की नजर में समाजघात के
गर सच्चे पैमां होंगे।
कई बैठे हैं जो ऊंचे मंचों पर
वे 'उस घर' के मेहमां होंगे ।।7।।

(आमीन!)

डॉ. रामकृष्ण सिंगी, 
साहित्यकार, कवि, लेखक, महू

Friday, September 6, 2013

कायम है मेरे दम से रौनक बहार में..........डॉ. माणिक विश्वकर्मा

   
किस्तों में बंट रहा हूं शहर हो रहा हूं मैं,
पनघट था बाँसुरी था कहर हो रहा हूं मैं।

अस्तित्व मेरा खतरे में पड़ गया है आज,
कटने लगा नदी था नहर हो रहा हूं मैं।

लहरों से खेलते हैं जो ताउम्र बेवजह,
उनको सबक सिखाने भँवर हो रहा हँ मैं।

मंदिर में रहा जब तक कोई जानता ना था,
बाजार में आते ही खबर हो रहा हँ मैं।

कायम है मेरे दम से रौनक बहार में,
लोगों को छाँव देने शजर हो रहा हँ मैं।

-डॉ. माणिक विश्वकर्मा

Thursday, September 5, 2013

पिसती चक्की थी? या मां?..................दिविक रमेश



रोज सुबह मुंह अंधेरे
दूध बिलोने से पहले
मां चक्की पीसती
और मैं आराम से सोता
तारीफों में बंधी
मां
जिसे मैंने कभी सोते
नहीं देखा
आज जवान होने पर
एक प्रश्न घुमड़ आया है
पिसती चक्की थी?
या मां?
-दिविक रमेश

Wednesday, September 4, 2013

इस मफ़लिसी के दौर से बचकर रहा करे..........अनिरुध्द सिन्हा



इस मफ़लिसी के दौर से बचकर रहा करे
बाहर ज़मीं की धूल है अंदर रहा करे ।

दहलीज़ को खंगालती रहती हैं बारिशें
मिट्टी के इन घरों में भी छप्पर रहा करे ।

जिससे कि चाँद ख्वाब के दामन में रह सके
ऑंखों में वो यक़ीन का मंज़र रहा करे ।

रिश्तों को ऑंख से नहीं इतना गिराइए
कुछ तो बिछुड़ के मिलने का अवसर रहा करे ।

गलियों में एहतियात के नारों के बावजूद
तहदारियों के हाथ में पत्थर रहा करे ।

-अनिरुध्द सिन्हा