Wednesday, June 5, 2013

वादा निभाना................संजय जोशी 'सजग "

 

विश्व पर्यावरण दिवस ......
अच्छी मानसून ,
अच्छी हरियाली ...
और शानदार पर्यावरण की ..
हार्दिक शुभ कामनाओ सहित 

....ऋता

वादा निभाना
प्रदूषण बचाना
मस्ती में जीना
........

पेड़ व पोधे
आक्सीजन वाहक
जीवन दाता
.........

पर्यावरण
पोलीथिन दुश्मन
समझे कौन
.........
पर्यावरण
जीवन आवरण
करो सुरक्षा
........
फटी छतरी
ग्लोबल वार्मिग
है प्रदूषण
.......
पर्यावरण
दुश्मनी न करो
बचाओ दोस्ती
......
है हरियाली
जीवन खुशहाल
सब निहाल

== संजय जोशी 'सजग "


Tuesday, June 4, 2013

मिलेगी बेवफ़ा से पर ज़फ़ा अक्सर............सतपाल ख्याल


वो आ जाए ख़ुदा से की दुआ अक्सर
वो आया तो परेशाँ भी रहा अक्सर

ये तनहाई ,ये मायूसी , ये बेचैनी
चलेगा कब तलक ये सिलसिला अक्सर

न इसका रास्ता कोई ,न मंजिल है
‘मोहब्बत है यही’ सबने कहा अक्सर

चलो इतना ही काफ़ी है कि वो हमसे
मिला कुछ पल मगर मिलता रहा अक्सर

वो ख़ामोशी वही दुख है वही मैं हूँ
तेरे बारे में ही सोचा किया अक्सर

ये मुमकिन है कि पत्थर में ख़ुदा मिल जाए
मिलेगी बेवफ़ा से पर ज़फ़ा अक्सर

--सतपाल ख्याल

Sunday, June 2, 2013

उठा कर क्यों न फेंकें सारी चीज़ें................ जॉन एलिया.



नया एक रिश्ता पैदा क्यों करें हम
बिछड़ना है तो झगडा क्यों करें हम

ख़ामोशी से अदा हो रस्मे-दूरी
कोई हंगामा बरपा क्यों करें हम

ये काफी है कि हम दुश्मन नहीं हैं
वफादारी का दावा क्यों करें हम

वफ़ा इखलास कुर्बानी मोहब्बत
अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यों करें हम

सुना दें इस्मते-मरियम का किस्सा
पर अब इस बाब को वा क्यों करें हम

ज़ुलेखा-ए-अजीजाँ बात ये है
भला घाटे का सौदा क्यों करें हम

हमारी ही तमन्ना क्यों करो तुम
तुम्हारी ही तमन्ना क्यों करें हम

किया था अहद जब लम्हों में हमने
तो सारी उम्र इफा क्यों करें हम

उठा कर क्यों न फेंकें सारी चीज़ें
फकत कमरों में टहला क्यों करें हम

नहीं दुनिया को जब परवाह हमारी
तो दुनिया की परवाह क्यों करें हम

बरहना हैं सरे बाज़ार तो क्या
भला अंधों से परा क्यों करें हम

क्यूँ ना चबा ले खुद ही अपना ढांचा
तुम्हे रातिब मुहय्या क्यों करे हम

हैं बाशिंदे इसी बस्ती के हम भी
सो खुद पर भी भरोसा क्यों करें हम

पड़ी रहने दो इंसानों की लाशें
ज़मीं का बोझ हल्का क्यों करें हम

ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती
यहाँ कारे-मसीहा क्यों करें हम



--- जॉन एलिया

इखलास = : purification, purity, sincerity, candour, selflessnessअहद = Promise, commitmentईफा = Fulfillment / Observanceबाब = खिड़की, windowवा = खुला, openरातिब = राशन , ration, portion of meals.बरहना = जिसके शरीर पर कोई वस्त्र न हो। कार = work , deed, function, duty

तुम्हारे अंगूरी नरम हाथों के लिए...........पाब्लो नेरूदा



ताकि तुम सुन सको मुझे
मेरे शब्दों को
कभी-कभी वे होते विरल

समुद्री चिड़ियों के पदचिह्नों-से समुद्र तटों पर
यह गलहार मदमस्त घण्टी,

छैलकड़ी तुम्हारे अंगूरी नरम हाथों के लिए
और मैं देखता अपने शब्दों को एक लम्बी दूरी से
मुझसे बहुत ‍अधिक वे तुम्हारे हैं,

लता की तरह मेरी पुरानी पीड़ाओं पर वे करते आरोहण
जो चढ़ती सीलन-भरी दीवारों पर इसी तरीक़े से,

इस निष्ठुर क्रीड़ा के लिए दोषी हो तुम,
वे निकल भागते मेरे उदास-अंधेरे बिछौने से,
सब कुछ भर देती हो, तुम भर देती हो सब कुछ

तुमसे पहले आबाद कर देते हैं मेरे शब्द
उस एकान्त को, जहां तुम जगह लेती हो,

और तुम्हारी बनिस्बत मेरी उदासी में अधिक काम के हैं वे!
अब मैं उन्हें कहना चाहता हूं जो चाहता रहा हूं मैं तुम्हें कहना
सुनने के लिए तैयार करते हुए कि; मैं चाहता हूं तुम सुनो मुझे

व्यथा की हवाएं चुपचाप खींच ले जाती हैं हमेशा की तरह
कभी-कभी सपनों के तूफान निश्शब्द खटखटाते हैं उन्हें

तुम ध्यान देती हो दूसरी आवाजों में मेरी दुखभरी अभिव्यक्ति के बीच
जैसे पुराने सुने शोकगीत, पुरानी प्रार्थनाओं के स्वभाव, कुल-गोत्र
प्यार करो मुझे मेरी साथी, यूं त्यागो नहीं,

अनुसरण करो मेरा, मेरी मित्र, दुख की इस तेज लहर में।
पर मेरे शब्द तो तुम्हारे प्रेम से रंगे हैं

घेर लिया है सब कुछ तुमने, तुमने घेर लिया सभी कुछ
रच रहा हूं उन्हें एक अन्तहीन माला में
तुम्हारे गोरे अंगूरों-से चिकने हाथों के लिए।


----पाब्लो नेरूदा 
वेब दुनिया काव्य संसार से





फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला..............निदा फ़ाज़ली


गरज बरस प्यासी धरती पर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने,बच्चों को गुडधानी दे मौला

दो और दो का जोड़ हंमेशा चार कहां होता है
सोच समझवालों को थोड़ी नादानी दे मौला

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें

झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला

फिर मूरत से बाहर आकर चारो ओर बिखर जा

फिर मंदिर को कोई मीरा दीवानी दे मौला

तेरे होते कोई किसी की जान का दुश्मन क्यों हैं

जीने वालों को मरने की आसानी दे मौला


......निदा फ़ाज़ली
श्री अशोक खाचर द्वारा प्रस्तुत
 

Saturday, June 1, 2013

मेंहदी बगैर काम कोणी चाल्लै..............विशाल दास...(याहू ग्रुप )


शादी ब्याव रो मौसम है
मेंहदी बगैर काम कोणी चाल्लै
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Smiles & Regards,
V I S H A L D A S
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गर बेटियों का कत्ल यूँ ही कोख में होता रहेगा.........डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’

 

गर बेटियों का कत्ल यूँ ही कोख में होता रहेगा!
शर्तिया इन्सान अपनी पहचान भी खोता रहेगा!!


मर जायेंगे अहसास सारे खोखली होगी हँसी,
साँस लेती देह बस ये आदमी ढोता रहेगा!!


स्वर्ग जाने के लिए बेटे की सीढी ढूँढ कर,
नर्क भोगेगा सदा ये आदमी रोता रहेगा!!


ढूँढ लेगा चंद खुशियाँ अपने जीने के लिए,
आदमी बिन बेटियों के मुर्दा बन सोता रहेगा!!


चैन सब खोना पड़ेगा बदनाम होगा आदमी,
बेटियों को मरने का दाग बस धोता रहेगा!!


--डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ’अरुण’