Tuesday, November 20, 2012

क्षितिज के पार...............डॉ. माधवी सिंह

मन को तृप्त करती तो है
रोशनी दिवस की
रात्रि के पहर में
क्षितिज के पार दिखाई देता है

 

अगणित तारे, तारामंडल
और नक्षत्रों का समूह
मन को अनंत की
सीमा के पार ले जाता है

जीवन के स्वरूप में
कुछ ऐसा ही रहस्य समाया है
सुख का मद और दुख की वेदना
एक ही चक्र की माया है

हां, जब चाह होगी उस दृष्टि की
जो आत्मा अनंत को दिखा सके
तब मिलेगा आनंद वह जो
है छिपा गहरे अंतरंग में।
- डॉ. माधवी सिंह


Friday, November 9, 2012

नग़मा-ए-शौक़..............मख़मूर सईदी

 
अब तक आए न अब वो आएँगे, कोई सरगोशियों में कहता है
ख़ूगरे-इंतिज़ार आँखों को, फिर भी इक इंतिज़ार रहता है

धड़कनें दिल की रुक सी जाती हैं, गर्दिशे-वक़्त थम सी जाती है
बर्फ़ गिरने लगे जो यादों की, जिस्म में रूह जम सी जाती है

इक सरापा जमाल के दिल में, मोजज़न जज़्बाऎ मोहब्बत है
चेहरा-ए-कायनात पर इस वक़्त, अव्वलीं सुबहा की लताफ़त है

मुस्कुराकर वो जान-ए-मोसीक़ी, मुझसे दम भर जो बोल लेती है
मुद्दतों के लिए इक अमृत सा, मेरे कानों में घोल देती है

हर नज़र में हैं लाख नज़्ज़ारे, हर नज़ारा नज़र की जन्नत है
दो मोहब्बत भरे दिलों के लिए, ज़िन्दगी कितनी ख़ूबसूरत है

मुस्कुराती हुई निगाहों में, सरख़ुशी का चमन महकता है
तेरी इक इक अदा-ए-रंगीं से नश्शा-ए-दिलबरी टपकता है 

मुद्दतों बाद फिर उसी धुन में, नग़मा-ए-शौक़ दिल ने गाया है
जानेजाँ! तेरे ख़ैरमक़दम को, गुमशुदा वक़्त लौट आया है
   




शायर - मख़मूर सईदी

हमेशा देर कर देता हूँ मैं.......... मुनीर निआज़ी





ज़रूरी बात कहनी हो
कोई वादा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो
उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं

मदद करनी हो उस की
यार को ढाढस बंधाना हो

बहुत देरीना रस्तों पे
किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं

बदलते मौसमों की सैर में

दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो
किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं

किसी को मौत से पहले

किसी ग़म से बचाना हो
हकीकत और थी कुछ उस को
जा के यह बताना हो

हमेशा देर कर देता हूँ मैं

--मुनीर निआज़ी

Monday, November 5, 2012

सहेली रेत की...............प्रकाश मंगल सोहनी



हाँथो से फिसलती रेत से
पूछा मेंने इक बार-
'कौन हे तेरी सहेली?'



मुस्कुराकर रेत ने कहा,
'वही, जो संग तुम्हारे गाती है
उलझा कर तुम्हें गीतों में
धीरे से फिसल जाती है। '

'मुझमें उसमें फर्क है इतना,
मैं हकीकत, वो एक सपना।
मेरी फिसलन दिखती है,
महसूस भी हो जाती है।'

'...पर वो निगोड़ी देकर अहसास,
सफर के साथ
फिसलकर हाँथों से
न जाने कहाँ खो जाती है,
मत पूछ उसका नाम
वो जिन्दगी कहलाती है.'


-प्रकाश मंगल सोहनी

Sunday, November 4, 2012

राधा अष्टमी है बुधवार को..... प्रेम से कहिये.... जय श्री राधे



राधे तू बड़ी भागनी , 
तैने कौन तपस्या कीन्ह // 
तीन लोक तारन तरण , 
सो तेरे आधीन// 
राधे - राधे जपे ते भव बाधा मिट जाए // 
कोटि जनम की आपदा 
राधा नाम से जाए // 
जय श्री राधे..........
राधा जी का जन्म दिन पर आप सभी को अशेष शुभ कामनाएँ

Monday, October 29, 2012

कभी तो झरो शब्द-बूंद.....स्मृति आदित्य

कभी तो झरो
मुझ पर
एक ऐसी शब्द-बूंद
कि मेरी मन-धरा पर
प्रस्फुटित हो जाए
शर्माया हुआ प्यार का कोमल अंकुर
सिर्फ तुम्हारे लिए।

कभी तो रचों
मेरे इर्द गिर्द
शब्द-फूलों का रंगीन समां
कि मैं महकने लगूं और
भर जाऊं खुशियों की गंध से
सिर्फ तुम्हारे लिए।
कभी तो आने दो
मेरे कजरारे बालों तक
नशीली
शब्द-बयार का झोंका
कि मेरे पोर-पोर में
खिल उठें
ताजातरीन कलियां
सिर्फ तुम्हारे लिए।

कभी तो पहनाओं
अपनी भावनाओं को
ऐसे शब्द-परिधान
कि ‍जिन्हें देखकर लहरा उठें
मेरे भीतर का भीगा सावन
सिर्फ तुम्हारे लिए।

मत बरसाओं मुझ पर
ऐसी शब्द-किरचें
कि होकर लहूलुहान
मैं, बस रिसते जख्म ही
ला सकूं
तुम्हारे लिए!


--स्मृति आदित्य

Sunday, October 28, 2012

प्रेम का मतलब तुम...............रविकांत






प्रेम-1 
प्रेम का मतलब है
तुम्हारे साथ रहना। 



 

प्रेम-2
तुम मुझे माफ नहीं करती
पर सारे अपमान पी कर भी
मैं तुम्हें मना लेता हूं।

हालांकि तुम कहती हो कि
इसका उल्टा ही सच है।

मैं बांहें फैलाकर
जरा-सा मुस्करा देता हूं।

प्रेम-3
तुम्हारे खिलाफ सुनी बहुत सी बातों पर
मुझे यकीन भी है।
पर उनकी चर्चा मैं तुमसे
कभी भी नहीं करूंगा।

पता नहीं ये बात
मेरे जेहन में है
या
तुम्हारे। 


--रविकांत