Monday, November 5, 2012

सहेली रेत की...............प्रकाश मंगल सोहनी



हाँथो से फिसलती रेत से
पूछा मेंने इक बार-
'कौन हे तेरी सहेली?'



मुस्कुराकर रेत ने कहा,
'वही, जो संग तुम्हारे गाती है
उलझा कर तुम्हें गीतों में
धीरे से फिसल जाती है। '

'मुझमें उसमें फर्क है इतना,
मैं हकीकत, वो एक सना।
मेरी फिसलन दिखती है,
महसूस भी हो जाती है।'

'...पर वो निगोड़ी देकर अहसास,
सफर के साथ
फिसलकर हाँथों से
न जाने कहाँ खो जाती है,
मत पूछ उसका नाम
वो जिन्दगी कहलाती है.'


-प्रकाश मंगल सोहनी

11 comments:

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    1. शुक्रिया आमिर भाई

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  2. प्रभावशाली रचना।

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    1. आभार
      आपने मेरी पसंद को सराहा

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  3. bahut khoob,jindgi ko paribhasit karti nayab prastuti'...पर वो निगोड़ी देकर अहसास,
    सफर के साथ
    फिसलकर हाँथों से
    न जाने कहँ खो जाती है,
    मत पूछ उसका नाम
    वो जिन्दगी कहलाती है.

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    1. मधु दी मेरे संग्रह पर आपका स्वागत है
      कृपया ब्लाग फालो करें ताकि नये पोस्ट की जानकारी आपके मिलती रहे
      सादर

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  4. यशोदा जी आपने मेरे ब्लॉग पर जो प्रश्न किया था, उस विषय में मेरे ब्लॉग पर 2 पोस्टें पहले से ही हैं:

    पोस्ट चोरी रोकने के लिए ये लेख पढ़ें:

    1. पोस्ट कॉपी (चोरी) करने वालों से बचने का उपाय
    2. आज ही अपनाइए 'ब्लॉग पोस्ट सुरक्षा कवच'

    इनमें से किसी एक या दोनों का इस्तेमाल कर सकती हैं

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  5. उलझा कर तुम्हें गीतों में
    धीरे से फिसल जाती है।
    बहुत खूबसूरत रचना

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    1. शुक्रिया
      आपने मेरी पसंद को सराहा

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  6. बहुत खूबसूरत रचना

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  7. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

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