Wednesday, April 18, 2012

काँटों में मुस्कुराओ तो कोई बात बने............मनीष गुप्ता

ख़यालों का तूफ़ा कब से दबाये बैठे हो
उसे होठों पे लाओ तो कोई बात बने
 
ख्वाब रोज़ रातों को देखा करते हो
कभी हकीकत में आओ तो कोई बात बने
 
यूं तो धरती पर सदियों से रहते हैं हम
तुम आसमां छू के दिखाओ तो कोई बात बने

        फूलों की खुशबू में खोये रहते हो रात दिन
        कभी काँटों में मुस्कुराओ तो कोई बात बने
 
मुझे यकीं है तुम मंजिल को पा लोगे एक दिन
 एक राह मुझको भी दिखाओ तो कोई बात बने

        यूं तो एहसास है हम सभी को अपने गमों का
        गैरों के आँसू अपनी आँख में लाओ तो कोई बात बने

 खुद झूठे हो मुझसे वफा की उम्मीद करते हो
 कभी दिल के अंधेरे को मिटाओ तो कोई बात बने

        ये धर्म ये समाज ये दक़ियानूसी बातें
        खुद को इनसे जुदा पाओ तो कोई बात बने

 लाख कोशिश के बाद कुछ न कुछ बन जाओगे तुम भी
 किसी के दिल में थोड़ी सी जगह पाओ तो कोई बात बने
-----मनीष गुप्ता

Thursday, April 5, 2012

वफ़ा करते हुए भी ये सुना है.............मनु भारद्वाज 'मनु'

बुराई पर भलाई कर रहा हूँ
मैं तुझसे आशनाई कर रहा हूँ

मुझे सुनता नहीं कोई यहाँ पे

फ़क़त मैं लबकुशाई कर रहा हूँ

मेरे दिल से ही मेरी दुश्मनी है

मै खुद से ही लड़ाई कर रहा हूँ

तबस्सुम इल्तिजा है अब तो आजा
मैं अश्कों की विदाई कर रहा हूँ

वफ़ा करते हुए भी ये सुना है

मैं तुझसे बेवफ़ाई कर रहा हूँ

'मनु' वो क़त्ल करना चाहता है

यहाँ मैं भाई-भाई कर रहा हूँ

-मनु भारद्वाज 'मनु'

Sunday, April 1, 2012

न शिकायत है, न ही रोए!..................प्रेमजी



ये उम्र तान करके सोए हैं,

थकान पांव-भर जो ढोए हैं।

किसी सड़क पे नहीं मिलती है,

सुबह जो गर्द में ये बोए हैं।

लोग कहते हैं कारवां चुप है,

सराय धुंध में समोए हैं।

नाव कब तक संभालते मोहसिम,

पहाड़ भी जहां डुबोए हैं।

रहन की छत है, ब्याज का बिस्तर,

न शिकायत है, न ही रोए हैं।

फफोले प्यार के निकल आए,

न जाने जिस्म कहां धोए हैं।

न कोई खौफ है अंधेरों से,

न कोई रोशनी संजोए है।

एक मुर्दा शहर-सा मौसम है,

एक मुर्दे की तरह सोए हैं।

ये कहानी कहीं छपे न छपे,

कलम की नोक हम भिगोए हैं।

- प्रेमजी

आँखें तरस रहीं हैं दीदार को उनके.........कुसुम सिन्हा

हवाओं में ऐसी ख़ुशबू पहले कभी न थी
ये चाल बहकी बहकी पहले कभी न थी

ज़ुल्फ़ ने खुलके उसका चेहरा छुपा लिया

घटा आसमा पे ऐसी पहले कभी न थी

आँखें तरस रहीं हैं दीदार को उनके
दिल में तो ऐसी बेबसी पहले कभी न थी

फूलों पे रख दिए हैं शबनम ने कैसे मोती
फूलों पे ऐसी रौनक पहले कभी न थी

यादों की दस्तकों ने दरे दिल को खटखटाया
आती थी याद पहले पर ऐसी कभी न थी...............
--------कुसुम सिन्हा

Monday, March 26, 2012

कांपते लब , आँख नम , कहा मुस्कुराकर 'अलविदा' ........सचिन अग्रवाल 'तन्हा'

तजरुबा जो ज़िन्दगी का याद था वो लिख दिया
ज़ेहन ओ दिल में कुछ जमा 'अवसाद' था वो लिख दिया ..........

कांपते लब , आँख नम , कहा मुस्कुराकर 'अलविदा'
एक लम्हा जो बहुत बर्बाद था वो लिख दिया..........

कागजों पर कैसे कोई ज़िन्दगी लिखता भला
हाँ मगर जो कुछ तुम्हारे बाद था वो लिख दिया ..............

कम नज़र आती है अब पत्थर उठाने की उम्मीद
सीने में थोडा बहुत 'फौलाद' था , वो लिख दिया ......................

----------सचिन अग्रवाल 'तन्हा'


Friday, March 23, 2012

वो स्पर्श तुम छोड़ जाओगी..........रंजन मिश्र

क्या तुम मुझे भूल जाओगी ?
मैं वर्षो से नहीं मिला तुमसे ,
ना ही सालो से बात की ,
तो क्या तुम मुझे भूल जाओगी ?
वो नदी किनारे की रात ,
तेरे हाथो में मेरा हाथ ,
वो स्पर्श तुम छोड़ जाओगी ,
तो क्या तुम मुझे भूल जाओगी ?
ऐ हमसफ़र ! मैं तेरा साथ न दे पाया ,
तेरे आंचल को थाम न पाया ,
उन नजरो का जादू तोड़ जाओगी ,
तो क्या तुम मुझे भूल जाओगी ?
तेरी गली नहीं गया ,
तेरी यादो को वही छोड़ आया ,
तो तुम रिश्ता तोड़ जाओगी ,
क्या तुम मुझे भूल जाओगी ?
वो दरवाजा जो वापसी का था ,
मैं उस पर ताला जड़ आया ,
तो तुम मुझसे मुंह मोड़ लोगी ,
क्या तुम मुझे भूल जाओगी ?

----- रंजन मिश्र

Tuesday, March 20, 2012

इश्क़ में इल्ज़ाम उठाने ज़रूरी हैं............हेमज्योत्सना 'दीप'

सफ़र के बाद अफ़साने ज़रूरी हैं
ना भूल पाए वो दीवाने ज़रूरी हैं

जिन आँखों में हँसी का धोखा हो
उनके मोती चुराने ज़रूरी हैं

माना के तबाह किया उसने मुझे,
मगर रिश्ते निभाने ज़रूरी हैं

ज़ख़्म दिल के नासूर ना बन जाए
मरहम इन पर लगाने ज़रूरी हैं

माना वो ज़िंदगी हैं मेरी लेकिन,
पर दूर रहने के बहाने ज़रूरी हैं

इश्क़ बंदगी भी हो जाए, कम हैं,
इश्क़ में इल्ज़ाम उठाने ज़रूरी हैं

महफ़िल में रंग ज़माने के लिए,
दर्द के गीत गुनगुनाने ज़रूरी है

रात रोशन हुई जिनसे सारी,
सुबह वो 'दीप' बुझाने ज़रूरी हैं।

--------हेमज्योत्सना 'दीप'