Thursday, November 14, 2013

रोइए ज़ार ज़ार क्यूँ? कीजिये हाय हाय क्यूँ?............मिर्ज़ा ग़ालिब



दिल ही तो है, न संग-ओ-ख़िश्त, दर्द से भर न आये क्यूँ?
रोएँगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताये क्यूँ?

दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आस्तां नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम, ग़ैर हमें उठाये क्यूँ?

क़ैद-ए-हयात-ओ-बंद-ए-ग़म असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यूँ?

जब वोह जमाल-ए-दिल-फरोज़, सूरत-ए-मेहर-नीमरोज़
आप ही हो नज़ारा-सोज़, परदे में मुंह छुपाये क्यूँ?

दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँसितां, नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अक्स-ए-रुख सही, सामने तेरे आये क्यूँ?

ग़ालिब-ए-खस्ता के बगैर, कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्यूँ? कीजिये हाय हाय क्यूँ?

मिर्ज़ा ग़ालिब
दैरः मंदिर

3 comments:

  1. बहुत सुंदर

    मित्रों कुछ व्यस्तता के चलते मैं काफी समय से
    ब्लाग पर नहीं आ पाया। अब कोशिश होगी कि
    यहां बना रहूं।
    आभार

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  2. चलिए माफ किया..पर जब आए तो खूबसूरत गजल से इसी तरह हमें रुबरु कराते रहें

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