Sunday, October 14, 2018

तुम थे तो हम थे... राहुल कुमार

लम्हे वो प्यार के जो जिए थे, वजह तुम थे
ख्वाब वो जन्नत के जो सजाये थे, वजह तुम थे 
दिल का करार तुम थे,
रूह की पुकार तुम थे
मेरे जीने की वजह तुम थे
लबों पे हँसी थी जो , वजह तुम थे
आँखों में नमी थी जो, वजह तुम थे
रातों की नींद तुम थे,
दिन का चैन तुम थे
मांगी थी जो रब से वो दुआ तुम थे
मेरी दीवानगी तुम थे,
मेरी आवारगी तुम थे
बनाया मुझे शायर,
वो शायरी तुम थे
तुम थे तो हम थे,
मेरी जिंदगी तुम थे
-राहुल कुमार

Saturday, October 13, 2018

बीच भँवर में डोले कश्ती.......डॉ. रजनी अग्रवाल 'वाग्देवी रत्ना'

जीवन में आई बाधाएँ
हमको नाच नचाती हैं,
सुलझ न पाए गुत्थी कोई
उलझन ये बन जाती हैं।

असमंजस का भाव जगातीं
दिल को ये भटकाती हैं,
मृग शावक से चंचल मन को
व्याकुल ये कर जाती हैं।

रिश्तों के कच्चे धागों में
उलझ गाँठ पड़ जाती हैं,
हस्त लकीरें भेद छिपातीं
उलझन फिर कहलाती हैं।

बीच भँवर में डोले कश्ती
मंज़िल नज़र न आती है,
व्यवधानों से घिर जाने पर
हिम्मत साथ निभाती है।

जीवन पथ पर उलझन सारी
भूल भुलैया बन जाती हैं,
धैर्य धरित सन्मार्ग चलाती
सुबुद्धि राह दिखाती है।

उलझन से घबराना कैसा
शक्ति हमें बतलाती है,
जो मन जीता वो जग जीता
कर्मठता सिखलाती है।
-डॉ. रजनी अग्रवाल 'वाग्देवी रत्ना'

डॉ. रजनी अग्रवाल “रत्ना”
संपादिका-साहित्य धरोहर
महमूरगंज, वाराणसी(मो.-9839664017)


Friday, October 12, 2018

मन की उलझन ....इन्दु सिंह

कभी सोचता है उलझनों में घिरा मन
क्या ठहर गया है वक्त ? नहीं,
वक्त वैसे ही भाग रहा है
कुछ ठहरा है तो वो है मन,
मन ही कर देता है कम
अपनी गति को
और करता है महसूस
ठहरे हुए वक्त को
उसे नज़र आती हैं सारी
जिज्ञासायें उसी वक्त में,सारी
निराशायें उसी वक्त में
पर ठहरा हुआ मन अचानक-
हो उठता है चंचल मृगशावक सा
और करता है पीछा उस वक्त का,
जो बीत गया है।
नहीं चल पाता जब वक्त के साथ
सोचता है तब उसका
ठहरा हुआ मन,कि ये ठहराव
वक़्त का नहीं
ये तो है सिर्फ़ मन की उलझन।
-इन्दु सिंह

Thursday, October 11, 2018

उलझन.....देवेन्द्र सोनी

उलझन रहती है
सदा ही हमारे आसपास।

हर उलझन का होता है 
हल भी वहीं-कहीं
पर हमारा वैचारिक द्वंद्व 
करता है देर, इन्हें सुलझाने में।

उलझन का हमारी जिंदगी से
गहरा नाता है 
सुलझती है एक तो 
रहती है दूसरी हर दम तैयार।

उलझन, 
उपजाती है मन में नैराश्य 
पर सुलझते ही इसके 
प्रफुल्लित हो जाता है मन।

कई तरह की होती हैं
उलझनें
जो कई बार होती हैं
हमारे सोच के दायरे से बाहर।

अनायास उपजी इन उलझनों को 
सुलझाने का सरल उपाय 
यही लगता है मुझे -
बनें वैचारिक स्तर पर मजबूत
छोड़ें न धैर्य, दें दिलासा 
जूझते मन और तन को, क्योंकि -
उलझने करती हैं परेशान और
देती हैं कष्ट हमारे अंतस को।

सुलझ तो जाती ही हैं ये 
कभी न कभी पर 
ले लेती हैं हमारे आत्मबल की 
परीक्षा भी, ये उलझनें।

जब कभी हो जीवन में 
उलझनों से सामना हमारा
रखें धैर्य, न छोड़ें आत्म विश्वास।

जानते ही हैं यह हम 
सुलझ तो जाएंगी ही सभी उलझनें 
क्योंकि होती ही है ये - 
बहुधा सुलझने के लिए ।
-देवेन्द्र सोनी 

Wednesday, October 10, 2018

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं .....दुष्यंत कुमार

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा 
मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा 

यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ 
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा 

ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनते 
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा 

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन सुन कर तो लगता है 
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा 

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में 
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा 

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं 
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा 

चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें 
कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा

- दुष्यंत कुमार 

Tuesday, October 9, 2018

उलझन.....राम लखारा "विपुल"


उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ

अहा! उलझन तुम हो धन्य
तुमसे प्रिय है न कोई अन्य

पग पग पर काँटों को सजा
फूलों का पुंज लिए विकल
लगती कुरूप हो वेदना सी
मगर अंतस सुंदर सकल
कंचन सम तन निखर रहा, तुम संग जितना सुलग रहा हूँ
उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ

यह भी कृपा रही तिहारी
रिश्तों की वह चार दीवारी

एक पल में ही जान गया
कौन अपना कौन पराया
कौन पथ का सच्चा साथी
कौन भीतर गरल समाया
मोती सारे बन गए आँसू, तव आँचल जितना सुबक रहा हूँ
उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ

पौरुष की पहचान जान ली
तन की सारी ख़ाक छान ली

तुम न होती तो कैसे में
ख़ुद को ही पहचान पाता
तुम बिन कैसे? बोलो! मैं
अपनी जय के गान गाता
नव पल्लव सा पनप रहा, तव रश्मि जितना झुलस रहा हूँ
उलझ रहा जितना जीवन में, पल पल उतना सुलझ रहा हूँ
-राम लखारा "विपुल"

Monday, October 8, 2018

शहर में जश्न हे, नैजो पे चढे है बच्चे ......मुजफ्फर हनफ़ी

दोस्तों नजरे फसादात नही होने की 
जान दे कर भी मुझे मात नहीं होने की 

उन से बिछड़े तो लगा जैसे सभी अपनो से
आज के बाद मुलाकात नहीं होने की

ये कड़े कोस मसाफत के बरस दिन तक है 
ओर दोराने सफर रात नही होने की 

बीच के लोग नकरीन बने रहते हैं 
दू बदू उन से मेरी बात नही होने की 

देखो मिट्टी को लहु से ना करो आलूदाह 
वर्ना इस साल भी बरसात नही होने की 

शहर में जश्न हे, नैजो पे चढे है बच्चे 
आज मकतब मे मुनाजात नही होने की 

मेरे मजहब ने सिखाया है मुजफ्फर मुझको 
जंग की मुझ से शुरूआत नही होने की 
- मुजफ्फर हनफ़ी