Wednesday, October 10, 2018

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं .....दुष्यंत कुमार

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा 
मैं सजदे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा 

यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ 
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा 

ग़ज़ब ये है की अपनी मौत की आहट नहीं सुनते 
वो सब के सब परेशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा 

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन सुन कर तो लगता है 
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा 

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उस के बारे में 
वो सब कहते हैं अब ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा 

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं 
ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा 

चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें 
कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा

- दुष्यंत कुमार 

9 comments:

  1. दुष्यंत जी की लेखनी बेमिसाल है बहुत खूबसूरत गज़ल।
    शुभ प्रभात नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं दी

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  2. नमस्ते,
    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 11 अक्टूबर 2018 को प्रकाशनार्थ 1182 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  3. वाह!!बहुत खूब!

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  4. दुष्यंत जी एवं उनकी खूबसूरत गज़ल...

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 11.10.18 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3121 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

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  6. वाह बहुत सुंदर 👌

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  7. बेहतरीन प्रस्तुति

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  8. शानदार लेखनी के मालिक सदा बहार दुष्यंत कुमार जी
    कब क्या लिखा,जब जो लिखा कभी ना पुराना हुवा होगा।
    बेमिसाल ।

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  9. यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बस्ते हैं
    ख़ुदा जाने यहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा
    चलो अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें
    कम-अज़-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा!!!!!!
    साहित्य के पुरोधा को नमन !!!!! कौन इनकी रचना पर लिखने की क्षमता रखता है !! नमन और सिर्फ नमन !!!

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