Wednesday, July 15, 2015

पाल बैठा बड़ी उम्मीद बेवफा तुमसे...नवीन त्रिपाठी


बहुत तन्हा हूँ मैं ये वक्त कह गया हमसे।
पाल बैठा बड़ी उम्मीद बेवफा तुमसे ।।

दोस्ती आज बे नकाब मेरी महफ़िल में ।
दीदार फिर से वो मेरा करा गया गम से ।।

फ़िक्र जिस जिस की मैं दिन रात किया करता था।
वही खंजर यहां मुझपर चला गया दम से ।।

मेरे नीलाम की बोली में वह भी हाजिर था ।
मेरी औकात की कीमत लगा गया कम से ।।

-नवीन त्रिपाठी
उर्दू शायरी बज़्म

Monday, July 13, 2015

जो उठा ले इसे बस वही मर्द है................अंसार क़म्बरी



चेहरा-चेहरा यहाँ आज क्यूँ ज़र्द है 
जिस तरफ़ देखिये दर्द-ही-दर्द है

अपने चेहरे में कोई ख़राबी नहीं 
आप के आईने पर बहुत गर्द है

इस क़दर हम जलाये गए आग में
अब तो सूरज भी अपने लिये सर्द है

साथ देता रहा आख़िरी साँस तक
दर्द को दर्द कहिये न हमदर्द है

बोझ है ज़िन्दगी, इसलिए ‘क़म्बरी’
जो उठा ले इसे बस वही मर्द है 

-अंसार क़म्बरी
..............फेसबुक से

Sunday, July 12, 2015

डराने वाला सुनकर डर रहा है...........आयुष ‘चराग़’


डराने वाला सुनकर डर रहा है
हथेली पर हमारा सर रहा है

जला देगा अगर रोका गया तो
अभी लावा सफ़र तय कर रहा है

दुआ दी थी जिसे जीने की तुमने
दुआ मर मर के पूरी कर रहा है

वो जिस बस्ती में दिखता है धुआँ सा
उसी बस्ती में मेरा घर रहा है

तिरा महबूब वो होने से पहले
हमारे साथ भी अक्सर रहा है

आयुष ‘चराग़’ 09953925743

Saturday, July 11, 2015

वक़्त लगता है यार मरने में........स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’


ज़िन्दगी का हिसाब करने में
हो गए ख़ाली क़िस्त भरने में

सतह पर तैरता हूँ बेहरकत
नब्ज़ डूबी मिरी उबरने में

उस ने आवाज़ तो लगायी थी
मैंने ही देर की ठहरने में

खारे आंसू मिला रहा हूँ मैं
तेरी यादों के मीठे झरने में

मैंने सब रंग ख़र्च कर डाले
तेरी ख़ाली जगह को भरने में

तेरा भी नाम खो दिया जानां
मेरी आवाज़ ने बिखरने में

उसने पूछा के आप स्वप्निल हैं?
कितना अच्छा लगा मुकरने में

सीढियां सारी तोड़ डाली हैं
तुमने अंदर मिरे उतरने में

कुछ तो ‘आतिश’ में आंच बाक़ी है
वक़्त लगता है यार मरने में

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 
08879464730

Friday, July 10, 2015

तुम्हारे हाथ में कालर हो..........दुष्यन्त कुमार



तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं 

मैं बेपनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ
मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं 

तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह
तू एक ज़लील-सी गाली से बेहतरीन नहीं 

तुम्हीं से प्यार जतायें तुम्हीं को खा जाएँ
अदीब यों तो सियासी हैं पर कमीन नहीं 

तुझे क़सम है ख़ुदी को बहुत हलाक न कर
तु इस मशीन का पुर्ज़ा है तू मशीन नहीं 

बहुत मशहूर है आएँ ज़रूर आप यहाँ
ये मुल्क देखने लायक़ तो है हसीन नहीं 

ज़रा-सा तौर-तरीक़ों में हेर-फेर करो
तुम्हारे हाथ में कालर हो, आस्तीन नहीं

-दुष्यन्त कुमार

Thursday, July 9, 2015

Interesting Traces of the Stones

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बेहद खूबसूरत

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Wednesday, July 8, 2015

कौन ये फ़ासला निभाएगा...........दुष्यन्त कुमार


मैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ
वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ 

एक जंगल है तेरी आँखों में
मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ 

तू किसी रेल-सी गुज़रती है
मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ 

हर तरफ़ ऐतराज़ होता है
मैं अगर रौशनी में आता हूँ 

एक बाज़ू उखड़ गया जबसे
और ज़्यादा वज़न उठाता हूँ 

मैं तुझे भूलने की कोशिश में
आज कितने क़रीब पाता हूँ 

कौन ये फ़ासला निभाएगा
मैं फ़रिश्ता हूँ सच बताता हूँ

-दुष्यन्त कुमार