Tuesday, July 7, 2015

क्यों न हुए.......ठाकुर दास 'सिद्ध'



बेखबर मिलता तो वो,बनाते बेवकूफ
बाखबर मिला तो कहते, बेखबर क्यों न हुए

फैली जब-जब आग नफरत की,तो इनके घर जले
पर कभी लपटों की जद में,उनके घर क्यों न हुए 

शैतानियत का हर हुनर, अब सीखने की होड़ है
इंसान की इन्सानियत के, कुछ हुनर क्यों न हुए

भरपूर होता दिख रहा है, हर बुराई का असर
नेक बातें भी हैं पर, उनके ऊपर असर क्यों न हुए

जो जमाने को कुचलने के, लिए हसरत खड़े हैं
इस समय की ओखली में, उनके सर क्यों न हुए

इसको जाना था जहां, उसको भी जाना वहीं था
एक  थी मंजिल तो फिर,वो हमसफर क्यों न हुए

'सिद्ध' ये चक्का समय का, बिन थमें चलता निरन्तर
थे उस पहर जो-जो मजे, वो इस पहर क्यों न हुए

-ठाकुर दास 'सिद्ध'
सुभाष नगर, दुर्ग, छत्तीसगढ़

Monday, July 6, 2015

ये ज़िन्दगी लहू में नहाईं हुई तो है.........‘काविश’ हैदरी



इस रंग में भी अपनी सफ़ाई हुई तो है
ये ज़िन्दगी लहू में नहाईं हुई तो है

जिस आग में झुलसता है ख़ुद आप का यक़ीं
वो आग आप ही की, लगाई हुई तो है

परदे में लाख छुपिये पर तस्वीर आपकी
ख़ाबो-ख़याल में सही, आई हुई तो है


भटके जो कोरचश्म कोई मेरा क्या क़ुसूर
रस्ते में मैंने शम्म, जलाई हुई तो है

आये न आये मर्ज़ी-ए-हुस्ने-सरापा-नाज़
बज़्मे-नियाज़ मैंने, सजाई हुई तो है

पहलू से उठ के चल दिए वो, हर अदा मगर
अब तक दिलो-दिमाग़ पे, छाई हुई तो है

पी कर जिसे दरीचा-ए-फ़िक्रे-सुख़न खुला
वो मय भी आप ही की, पिलाई हुई तो है

मानें न मानें आप हक़ीक़त है ये मगर
झूठे ख़ुदाओं से भी, ख़ुदाई हुई तो है

हैरत की बात है कि अभी तक न भर सका
‘ये ज़ख़्मे-दिल है इसकी, दवाई हुई तो है’

‘काविश’ ये बात अलग है न कुछ गुफ़्तगू हुई
उनके हुज़ूर तेरी, रसाई हुई तो है

‘काविश’ हैदरी, 

Sunday, July 5, 2015

आओ, हम फिर से जिएं.............अजित कुमार













आओ हम फिर से जिएं
बहता-बहता मेघखंड जो
पहुंच गया है वहां क्षितिज तक...
लौटा लाएं उसे,
कहें :
'ओ, फिर से बहो!
मंद, मंथर, मृदु ‍गति से...
शोभावाही मेघ, रसीले मेघ, दूत!
जो कथा कही थी, फिर से कहो!'

और...
अपलक, अविचल
हम उसे निरखते रहें, सुनें!

-अजित कुमार

Saturday, July 4, 2015

दौलत तो दुनिया छोड़ जाती है ...................सचिन अग्रवाल



बहुत कुछ ज़िन्दगी चेहरे पे लिक्खा छोड़ जाती है
कि आंधी जैसे कोई गाँव उजड़ा छोड़ जाती है

तुम इन रंगीनियों के बाद का भी सोचकर रखना
हो कितनी खूबसूरत शाम अँधेरा छोड़ जाती है 

कई शाहों के सर सजदे में झुकते हैं मज़ारों पर
फ़क़ीरी जाते जाते भी ये रूतबा छोड़ जाती है

तो फिर क्यूँ चहचहाहट बोझ लगती है ज़माने को
विदा के वक़्त तिनके तक तो चिड़िया छोड़ जाती है

हुनर को वक़्त लगता है बहुत मायूस होने में
यूँ ही थोड़ी कोई मजबूरी क़स्बा छोड़ जाती है

नहीं कोई और ही होगा वो औरत के लिबादे में
कभी माँ भी सड़क पर अपना बच्चा छोड़ जाती है

महज़ कह देने से क्या वक़्त सब ज़ख्मों को भर देगा
तवाइफ़ उम्र ढलने पर क्या कोठा छोड़ जाती है

मज़ा तो तब है कोई खुद को ही जब छोड़ कर जाए
ये गाडी, घर, ज़मीं, दौलत तो दुनिया छोड़ जाती है 

(नए मरासिम में प्रकाशित)

-सचिन अग्रवाल

Friday, July 3, 2015

हँसी कायनात तो होगी...........प्रस्तुति स्वप्निल‬



अपनी कश्ती भी मझधार के पार तो होगी।
कभी साहिल से हमारी मुलाक़ात तो होगी।।

जिंदगी भले ना मिले कभी आरजुओं वाली। 
सुकूँ से लबालब भरी हुई एक रात तो होगी।।

अपने वैसे सिलसिले जो कभी शुरू नही हुए।
चलो इसी बहाने एक नयी शुरुवात तो होगी।।

अब कब तलक हमसे दूर रहना है जनाब को।
अपने प्यार की एक हँसी कायनात तो होगी।।

सुलगने दो रात को तन्हाइयों का शोर काफी है।
आज साथ हमारे मुरादों वाली बरसात तो होगी।।

अब आओ मुझमें सिमट जाओ तुम सदा के लिए।
मिलन में धरती और आकाश जैसी बात तो होगी।।

'दिलचन' को बतायेंगे हम हाल-ए-मुहब्बत अपना।
फिर उस ओर से हमें मिलाने की करामात तो होगी।।

प्रस्तुतिः यू एस मिश्रा 'स्वप्निल'‬ 

मेरी ओर से एक स्पष्टिकरणः
श्री यू एस मिश्रा  दिनांक एक जुलाई को मित्र बने
और आज क्या देखती हूँ
कि वे अपना फेसबुक प्रोफाईल हटा चुके हैं
रचना पठनीय है अतः आप इस रचना का अवलोकन करें
तथा मूल श़ायर का नाम भी बताएँ
सादर...
यशोदा 

Thursday, July 2, 2015

भरथरी गायक.............केशव तिवारी
















जाने कहां-कहां से
भटकते-भटकते
आ जाते हैं ये भरथरी गायक

कांधे पर अघारी
हाथ में चिकारा थामे
हमारे अच्छे दिनों की तरह ही ये
देर तक नहीं टिकते

पर जितनी देर भी रुकते हैं
झांक जाते हैं
आत्मा की गहराइयों तक

घुमन्तु-फिरन्तु ये 
जब टेरते हैं चिकारे पर
रानी पिंगला का दुःख
सब काम छोड़
दीवारों की ओट से 
चिपक जाती हैं स्त्रियां

यह वही समय होता है
जब आप सुन सकते हैं
समूची सृष्टि का विलाप

-केशव तिवारी
....तरंग से,15 मार्च




Wednesday, July 1, 2015

नहीं जानती क्यों.....फाल्गुनी





नहीं जानती क्यों
अचानक सरसराती धूल के साथ
हमारे बीच
भर जाती है आंधियां
और हम शब्दहीन घास से
बस नम खड़े रह जाते हैं

नहीं जानती क्यों
अचानक बह आता है
हमारे बीच
दुखों का खारा पारदर्शी पानी
और हम अपने अपने संमदर की लहरों से उलझते
पास-पास होकर
भीग नहीं पाते...

नहीं जानती क्यों
हमारे बीच महकते सुकोमल गुलाबी फूल
अनकहे तीखे दर्द की मार से झरने लगते हैं और
उन्हें समेटने में मेरे प्रेम से सने ताजा शब्द
अचानक बेमौत मरने लगते हैं..
नहीं जानती क्यों.... 

--फाल्गुनी