Monday, May 21, 2012

तआक़ुब में गई सारी जवानी.......अमजद इस्लाम 'अमजद'

मैं भींगती आँखों से उसे कैसे हटाऊँ
मुश्किल है बहुत अब्र में दीवार उठानी
अब्र = घटा,

निकला था तुझे ढूंढने इक हिज्र का तारा
फिर उसके तआक़ुब में गई सारी जवानी
 हिज़्र = जुदाई, तआक़ुब = पीछा,

कहने को नई बात कोई हो तो सुनाएं
सौ बार ज़माने ने सुनी है ये कहानी

किस तरह मुझे होता गुमां तर्के-वफ़ा का
आवाज़ में ठहराव था, लहजे में रवानी
गुमां = अंदाजा

अब मैं उसे कातिल कहूं 'अमजद' कि मसीहा
क्या जख्मे-हुनर छोड़ गया अपनी निशानी


---अमजद इस्लाम  'अमजद'

Sunday, May 20, 2012

बोझिल आहें देती हैं दुहाई...............दीप्ति शर्मा

अथाह मन की गहराई
और मन में उठी वो बातें
हर तरफ है सन्नाटा
और ख़ामोश लफ़्ज़ों में
कही मेरी कोई बात
किसी ने भी समझ नहीं पायी
कानों में गूँज रही उस
इक अजीब सी आवाज़ से
तू हो गयी है कितनी पराई ।

अब शहनाई की वो गूँज
देती है हर वक्त सुनाई
तभी तो दुल्हन बनी तेरी
वो धुँधली परछाईं
अब हर जगह मुझे
देने लगी है दिखाई
कानों में गूँज रही उस
इक अजीब सी आवाज़ से
तू हो गयी है कितनी पराई ।

पर दिल में इक कसर
उभर कर है आई
इंतज़ार में अब भी तेरे
मेरी ये आँखें हैं पथराई
बाट तकते तेरी अब
बोझिल आहें देती हैं दुहाई
पर तुझे नहीं दी अब तक
मेरी धड़कनें भी सुनाई
कानों में गूँज रही उस
इक अजीब सी आवाज़ से
तू हो गयी है कितनी पराई ।


© दीप्ति शर्मा

Saturday, May 5, 2012

मिज़ाज पत्थर का.......डॉ. मोईनुद्दीन ‘शाहीन’

हर तरफ है रिवाज पत्थर का
रिश्ते-नाते, समाज पत्थर का
 
नाव काग़ज़ की चल न पाई तो
कीजिए काम-काज पत्थर का
पूछते हैं तबीब आ आकर
रोज़ हमसे इलाज पत्थर का
 
आज फूलों की हुक्मरानी है
कल जहां पर था राज पत्थर का
 
ख़ून से लाल हो गई धरती
देखिए एहतेजाज पत्थर का
 
बादशाहे-ज़मां ने बिलआखि़र
रख लिया सर पे ताज पत्थर का
 
हम ना कहते थे होशियार रहो
अब चुकाओ खि़राज पत्थर का
 
मोम जैसी सिफ़ात वाले भी
काम करते हैं आज पत्थर का
 
पानी-पानी में हो गया ‘शाही’
जूं ही बदला मिज़ाज पत्थर का

-----डॉ. मोईनुद्दीन ‘शाहीन’
https://www.facebook.com/www.naighazal.in
प्रस्तुतिः अमितेश जैन

Monday, April 30, 2012

एक गीत कोयल का सुना दो...............विवेक रतन सिंग

एक रुपहली रात 
हम दोनों हैं साथ 
चुप -चुप मैं और तुम 
चाँद कहे अपने दिलों की बात 
****************** 
अँधेरे में सपनों की 
बस होने दो मुलाकात 
और डूबने दो ख्यालों में मेरे 
तुम अपने ख्यालात 
*********************** 
लड़ने दो खामोशियों 
को उदासियों को जूझने दो 
जवाब कुछ सवालों के 
दिमाग को सूझने दो 
********************** 
आँखों ही आँखों में 
धडकनों को तुम घूमने दो 
सांसों को दो प्रेमियों की तरह 
देह की रंग-रंग में झूमने दो 
********************** 
बहा दो झरने चट्टानों से 
घोंसलों में पक्षियों को बसा दो 
पेड़ों की पत्तियों को तुम 
एक गीत कोयल का सुना दो 
************************ 
अनमोल जो भी मोती है 
उसे समुन्दर के सीप में छुपा दो 
और करके शरारत ठंडी बर्फ सी तुम 
शीतल मुस्कान से मुस्का दो 
***************************** 
सुहाना मौसम देखो साथ 
लेलो हाथ में मेरा हाथ 
रिमझिम हो रही है बरसात 
तुम हो आस्था,मैं विश्वास 
***************************** 
एक रुपहली रात 
हम दोनों हैं साथ 
चुप -चुप मैं और तुम 
चाँद कहे अपने दिलों की बात
 ----विवेक रतन सिंग 
गूगल+ से साभार

Wednesday, April 25, 2012

चांद के पास जो सितारा है.........ज्योति जैन

दूज के चांद के पास
टिमटिमाते तारे-सा
अस्तित्‍व मेरा।
रोशनी से उसकी
प्रदीप्‍त होता वजूद।
पर खुश हूं
इस अस्तित्‍व से,
जो जुदा नहीं चांद से।
खुश्‍ा हूं
उसकी निकटता से।
और इस बात से
कि शीतलता चांद की
समेट लेती है
तमाम उष्‍मा
मेरे अस्तित्‍व की,
मौका नहीं देती,
कभी जलने का।
चांदनी बरसाते चांद के पास
अस्तित्‍व मुझ उग्र तारे का।
--ज्योति जैन

यूँ ज़न्नत को पाना भी ठुकराना भी....अज्ञात(प्रस्तुतिकरणः सोनू अग्रवाल )

उसको अपना बना के देखा, कर देखा बेगाना भी
जिस गुलशन को शाद किया था किर बैठे वीराना भी

हमने अपने चमन में देखे एक मौसम के दोनों रंग

एक पल में कुछ कलियाँ खिलना एक पल में मुरझाना भी

मन की व्याकुल इच्छाओं का बोलो क्या अंजाम लिखूं

छहूँ तेरे पास ठहरना और सफ़र पर जाना भी

दिल चाहे अब लिखते रहना हर धड़कन पर उसका नाम

उसकी खातिर जिंदा रहना उसके लिए मार्जन भी

एक खुदा की नेमत खोना रस्मे दुनियां की खातिर
बहुत कठिन है यूँ ज़न्नत को पाना भी ठुकराना भी..!!
---अज्ञात(कृपया नाम बताएं)
प्रस्तुतिकरणः सोनू अग्रवाल



Tuesday, April 24, 2012

अब भी मिटा मिटा सा है.......अज्ञात(प्रस्तुतिकरणः सोनू अग्रवाल)

तुम्हारे साथ के
कुछ भीगे सावन
अब भी गीले पड़े हैं...

उम्र गुजर रही है
मगर होंठ
अब भी सिले पड़े हैं..............

कुछ चाहतों के दबे ख़त
कुछ ख्वाहिशों की अधूरी
ग़ज़ल...........

रात के दुसरे पहर में
अनदेखे ख्वाब
सिसक उठते हैं...............

और आँगन के
गमले में
पोधों के पत्ते
अब तक पीले पड़ें हैं...........

तुम्हारा नाम
नीली स्याही से
मेरी हथेलियों में
अब भी मिटा मिटा सा है...........

मुझे नहीं पता
मेरी किस्मत में तुम
कितनी हांसिल हो..........

चलो दूर सही
तुम मेरी हिचकियों में
अब भी शामिल हो !!!
--अज्ञात 
प्रस्तुतिकरणः सोनू अग्रवाल