Saturday, October 2, 2021

एक उद्योगपति को शिक्षक की समझाइश

 


एक उद्योगपति को  शिक्षक की समझाइश


 एक बड़े  उद्योगपति शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों को संबोधित कर रहे थे-  "देखिए! बुरा मत मानिए ! लेकिन जिस तरह से आप काम करते हैं; जिस तरह से आपके संस्थान चलते हैं यदि मैं ऐसा करता तो अब तक मेरा बिजनेस डूब चुका होता । "चेहरे पर सफलता का दर्प साफ दिखाई दे रहा था !

 "समझिए ! आपको बदलना होगा;  आपके राजकीय संस्थानों को बदलना होगा; आप लोग आउटडेटेड पैटर्न पर चल रहे हैं;  और सबसे बड़ी समस्या आप शिक्षक स्वयं हैं, जो किसी भी परिवर्तन के विरोध में रहते हैं  !"

"हमसे सीखे ! बिजनेस चलाना है तो लगातार सुधार करना होता है किसी तरह की चूक की कोई गुंजाइश नहीं !"

प्रश्न पूछने के लिए एक शिक्षिका का हाथ खड़ा था..!

"सर ! आप दुनिया की सबसे अच्छी कॉफी बनाने वाली कंपनी के मालिक हैं ।  एक जिज्ञासा थी  कि आप कॉफी के कैसे बीज खरीदते हैं..? "

उद्योगपति का गर्व भरा ज़वाब था-  "एकदम सुपर प्रीमियम! कोई समझौता नहीं..!" 

शिक्षिका ने फिर पूछा:-
"अच्छा मान लीजिए आपके पास जो माल भेजा जाए उसमें कॉफी के बीज घटिया क्वालिटी के हों तो..??"

उद्योगपति:-
" सवाल ही नहीं ! हम उसे  तुरंत वापस भेज देंगे; वेंडर कंपनी को ज़वाब देना पड़ेगा;  हम उससे अपना क़रार रद्द कर सकते हैं !

कॉफी के बीज के चयन के हमारे बहुत सख्त मापदंड है, इसी कारण हमारी कॉफी की प्रसिद्धि है! 

"आत्मविश्वास से भरे उद्योगपति का लगभग स्वचालित उत्तर था !

शिक्षिका:-
 "अच्छा है ! अब हमें यूँ समझिए कि हमारे पास रंग-स्वाद-और गुण में अत्यधिक विभिन्नता के बीज आते हैं लेकिन हम अपने कॉफी के बीज वापस नहीं भेजते !"

"हमारे यहां सब तरह के बच्चे आते है; अमीर-गरीब, होशियार-कमजोर,  गाँव के-शहर के,  चप्पल वाले-जूते वाले,  हिंदी माध्यम के-अंग्रेजी माध्यम के, शांत- बिगड़ैल...सब तरह के  !
हम उनके अवगुण देखकर उनको निकाल नहीं देते ! 

सबको लेते हैं ;..सबको पढ़ाते हैं;,..सबको बनाते हैं.. !"

"..... क्योंकि सर !  हम व्यापारी नहीं,  शिक्षक हैं ।

सदैव प्रसन्न रहिये!!....जो प्राप्त है-पर्याप्त है!!

लॉक डाउन में शिक्षक वर्ग की किसी को सुध लेने का ख्याल तक नहीं आ रहा। फिर भी सबसे शांत चित्त वही वर्ग है। पता है क्यों क्योंकि वह राष्ट्र निर्माता है, अगर वह विचलित हो गया तो पुनर्निर्माण संभव नही।

5 comments:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (3-10-21) को "दो सितारे देश के"(चर्चा अंक-4206) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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    कामिनी सिन्हा


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  2. वाह बहुत ही प्रेरणादायक लघुकथा!

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  3. बहुत सुन्‍दर। 'बडे लोगों' के दिमाग को झनझनादेनेवाली।

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  4. बिल्कुल सही कहा आपने, समाज में यदि शिक्षक अपनी भूमिका से विमुख हो जायगा, तो राष्ट्र निर्माण असंभव हो जायगा

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