Thursday, February 5, 2015

जीने की तमन्ना में ही मर जाते हैं लोग...........नफ़स अम्बालवी



यूँ तो खुद अपने ही साये से भी डर जाते हैं लोग
हादसे कैसे भी हों लेकिन गुज़र जाते हैं लोग

जब मुझे दुश्वारियों से रूबरू होना पड़ा
तब मैं समझा रेज़ा रेज़ा क्यों बिखर जाते हैं लोग

सिर्फ ग़ाज़ा ही नहीं चेहरों की रानाई का राज़
शिद्दते-ग़म की तपिश से भी निखर जाते हैं लोग

हर 'नफ़स' मर मर के जीते हैं तुझे ऐ ज़िन्दगी
और जीने की तमन्ना में ही मर जाते हैं लोग !!

-नफ़स अम्बालवी

ग़ाज़ा : मुँह पर लगाने का पाउडर;
नफ़स : साँस

 

10 comments:

  1. बेहतरीन ग़ज़ल।

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  2. yeh dil jub kisi ko itni shiddut se chahuta he, sachi mohabbut me, uske peechhe karmo ka asar--prarbdh ki urza hoti he, jo abad ker deti he ya jala bhi sakti he

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (06.02.2015) को "चुनावी बिगुल" (चर्चा अंक-1881)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

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  4. बहुत ही सुंदर गजल है ... और जीने के तमन्ना में ही मर जाते है लोग ..बहुत खूब ...
    मेरे ब्लॉग पर आप सभी लोगो का हार्दिक स्वागत है.

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  5. बहुत सुन्दर रचना

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  6. लाजवाब प्रस्तुति...

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  7. बहुत सुंदर शेर कहे गये हैं

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