Wednesday, January 15, 2020

मौन के भी शब्द होते हैं.....गुन्जन


हाँ मौन के भी "शब्द" होते हैं
और बेहद मुखर भी
चुन -चुन कर आते हैं ये उस अँधेरे से
जहाँ मौन ख़ामोशी से पसरा रहता है
बिना शिकायत -
बैठे-बैठे न जाने क्या बुनता रहता है .. ?
शायद शब्दों का ताना-बना

और ये शब्द विस्मित कर देते हैं
तब.... जब वो सामने आते हैं
प्रेम की एक नयी परिभाषा गढ़ते हुए
अथाह सागर ... असीमित मरुस्थल ... जलद व्योम
न जाने कितना कुछ
अपने में समेटे हुए .. छिपाए हुए
ओह ...... !!

जब सुना था उन्हें .... तब रो पड़ी थी मैं
हाँ मौन के भी शब्द होते हैं
और बेहद मुखर भी
कभी सुनना उन्हें
रो दोगे तुम भी ...... जानती हूँ मैं
अभी भी कितना कुछ समेटे हैं अपने भीतर
भला तुम क्या जानो .. ?


लेखिका परिचय - गुन्जन

Tuesday, January 14, 2020

हवा रो रही है ...दिव्या भसीन

सिसकती है डाली हवा रो रही है।
कली अधखिली फिर से रौंदी गई है।।

फ़िज़ा में उदासी घुली इस तरह अब,
जुबां सिल गयी आँख में भी नमी है।

मेरी ख़ैर ख़्वाही का दावा था करता,
तबाही मेरी देख लब पर हँसी है।

हुए तन्हा हम ज़िन्दगी के सफ़र में,
लगे अपनी सूरत ही अब अजनबी है।

यकीं है मुझे जिसकी रहमत पे हरदम,
उसे चारसू ही नज़र ढूंढती है।

उसे रात के क्या अँधेरे डरायें,
जो ताउम्र ख़ुद तीरगी में पली है।

नसीबा करो बंद अब आज़माना
ख़बर भी है क्या मेरी जां पर बनी है।
-दिव्या भसीन

Monday, January 13, 2020

औरत का दर्द ...दिनेश ध्यानी

औरत का दर्द
आजीवन पराश्रित
कहने को तो घर की लक्ष्मी
हक़ीक़त में
लाचार और विवश।

जन्मने से पहले
जन्मने के बाद न जाने
कब दबा दिया जाय
इसका गला।

तरेरती आँखें नोचने को तत्पर
न घर, न बाहर रही अब सुरक्षित,
जीवन की रटना
जीवनभर खटना
दूसरों की खातिर
खुद को होम करना।
-दिनेश ध्यानी

Sunday, January 12, 2020

हाइकु-मालिका ...मीनू खरे

पूस की रात
खुला आसमाँ और
आवारा कुत्ते!

क्या कहते हैं?
भौं-भौं करके ये 
आवारा कुत्ते!

रात भर ये
खुली जंग लड़ते
ठिठुरन से ।

अगले दिन
धूप से बतियाते 
आवारा कुत्ते!

हाड़ कँपाएँ
ठंड की लम्बी रातें
खुला आसमाँ।

सहनशक्ति
ओढ़कर सो जाते 
आवारा कुत्ते!

चन्द टुकड़े
रोटियाँ खाकरके
पूँछ हिलाते।

चौकीदारी से
हक़ अदा करते
आवारा कुत्ते!

आज का युग
आस्तीन के साँपों का-
हाँ ये सच है!

वफ़ादारी से
हैराँ कर जाते हैं
आवारा कुत्ते!
-मीनू खरे
meenukhare@gmail.com
मूल रचना

Saturday, January 11, 2020

सन्तोष ...रेवा टिबड़ेवाल

जब मन उदास होता है
और तुम्हारा साथ नहीं
मिलता
तो तुम्हारे लिखे शब्द
पढ़ लेती हूँ

हर बार उन्हें पढ़ कर
चेहरे पर मुस्कुराहट
तैर जाती है
संतोष से भर उठता है मन
के दुनिया के एक कोने में
कोई है जो मुझे मुझसे बेहतर
जानता है
जो हर बार कुछ ऐसा महसूस
कराता है की जिंदगी से
प्यार हो जाता है
जिसका प्यार मुझे कमज़ोर
कतई नहीं करता
बल्कि
दोगुनी ताक़त से भर देता है
जानते हो
दुनिया कैसी भी हो
पर जब तक तुम जैसे
प्यार करने
वाले इंसान ज़िंदा है
दुनिया में अच्छाई और
इंसानियत कायम
रहेगी
-रेवा 
मूल रचना

Friday, January 10, 2020

नागफनी आँचल में बान्ध सको तो आना ....किशन सरोज

हिंदी के श्रेष्ठ कवि और गीतकार 
स्मृतिशेष किशन सरोज जी 
का निधन 8 जनवरी 2020 को हुआ।
 वे  काफी समय से बीमार चल रहे थे, 
हालत दिन ब दिन बिगड़ती जा रही थी और 
कुछ दिनों से लोगों को पहचान भी नहीं पा रहे थे।

प्रस्तुत है उनकी एक कविता

नागफनी आँचल में बाँध सको तो आना
धागों बिन्धे गुलाब हमारे पास नहीं।

हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोए, आधे जागे
थोड़े सुख के लिए उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे

कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित
इसका सही हिसाब हमारे पास नहीं।

हमने व्यथा अनमनी बेची
तन की ज्योति कंचनी बेची
कुछ न बचा तो अँधियारों को
मिट्टी मोल चान्दनी बेची

गीत रचे जो हमने, उन्हें याद रखना तुम
रत्नों मढ़ी किताब हमारे पास नहीं।

झिलमिल करती मधुशालाएँ
दिन ढलते ही हमें रिझाएँ
घड़ी-घड़ी, हर घूँट-घूँट हम
जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ

पी कर जिसको चित्र तुम्हारा धुँधला जाए
इतनी कड़ी शराब हमारे पास नहीं।

आखर-आखर दीपक बाले
खोले हमने मन के ताले
तुम बिन हमें न भाए पल भर
अभिनन्दन के शाल-दुशाले

अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, यह मत पूछो
कोई अभी जवाब हमारे पास नहीं।
30  जनवरी 1939 - 08 जनवरी 2020
-किशन सरोज
सादर श्रद्धा सुमन

Thursday, January 9, 2020

मौत ने कहा .....कुंवर नारायण

फ़ोन की घण्टी बजी
मैंने कहा — मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया।

दरवाज़े की घण्टी बजी
मैंने कहा — मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया।

अलार्म की घण्टी बजी
मैंने कहा — मैं नहीं हूँ
और करवट बदल कर सो गया।

एक दिन
मौत की घण्टी बजी...
हड़बड़ा कर उठ बैठा —
मैं हूँ... मैं हूँ... मैं हूँ..

मौत ने कहा —
करवट बदल कर सो जाओ।
-स्मृतिशेष कुंवर नारायण