Sunday, October 7, 2018

फल्गु के तट पर !!!!!......सीमा 'सदा'

फल्गु के तट पर
पिण्डदान के व़क्त पापा
बंद पलकों में आपके साथ
माँ का अक्स लिये
तर्पण की हथेलियों में
श्रद्धा के झिलमिलाते अश्कों के मध्य
मन हर बार
जाने-अंजाने अपराधों की
क्षमायाचना के साथ
पितरों का तर्पण करते हुये
नतमस्तक रहा !
...
पिण्डदान करते हुये
पापा आपके साथ
दादा का परदादा का
स्मरण तो किया ही
माँ के साथ
नानी और परनानी को
स्मरण करने पे
श्रद्धा के साथ गर्व भी हुआ
ये 'गया' धाम निश्चित ही
पूर्वजों के अतृप्त मन को
तृप्त करता होगा !!
...
रिश्तों की एक नदी
बहती है यहाँ अदृश्य होकर
जिसे अंजुरि में भरते ही
तृप्त हो जाते है
कुछ रिश्ते सदा-सदा के लिये !!!!

-सीमा 'सदा'

Saturday, October 6, 2018

आज के लिए मेरे शब्द !!............कविता गुप्ता

आज, फिर मन में आया, 
शब्दों की पिटारी खोल लूँ। 
विवेक का पल्लू पकड़ कर 
चुनिंदा, जादुई शब्द ढूँढ लूँ। 

जिनमें हो आकर्षण अनन्त 
हों मस्त पुरवाई से, स्वछंद। 
सुबह की ओस में नहाए हुए 
लिए भीनी २ फूलों की सुगंध। 

राही कुछ सीखें, ऐसा लुभाएँ,
वात्सल्य भरी ठंडक पहुँचाएँ। 
एक नन्हा जीव दे रहा दस्तक 
द्वार पर 'स्वागत है' लिख जाएँ।
-कविता गुप्ता

Friday, October 5, 2018

आरती का दिया...... गोपाल दास नीरज


तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।

भटकती निशा कह रही है कि तम में 
दिये से किरन फूटना ही उचित है,
शलभ चीखता पर बिना प्यार के तो 
विधुर सांस का टूटना ही उचित है,
इसी दर्द में रात का यह मुसाफ़िर, 
न रुक पा रहा है, न चल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।  

मिलन ने कहा था कभी मुस्करा कर,
हँसो फूल बन, विश्व-भर को हंसाओ 
मगर कह रहा है, विरह अब सिसक कर,
इसी से नयन का विकल जल-कुसुम यह,
न झर पा रहा है, न खिल पा रहा है।
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है। 
           
कहाँ दीप है जो किसी उर्वशी की 
किरन-उंगलियों को छुए बिना जला हो?
बिना प्यार पाए किसी मोहिनी का
कहां है पथिक जो निशा में चला हो!
अचंभा अरे कौन फिर जो तिमिर यह 
न गल पा रहा है, न ढल पा रहा है।  
तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है। 


किसे है पता धूल के इस नगर में,
कहाँ मृत्यु वरमाल ले कर खड़ी है?
किसे ज्ञात है प्राण की लौ छिपाए 
चिता में छुपी कौन सी फुलझड़ी है?
इसी से यहां राज़ हर ज़िन्दगी का 
न छुप पा रहा है, न खुल पा रहा है,
          न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।    

तुम्हारे बिना आरती का दिया यह,
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।
-गोपाल दास नीरज

Thursday, October 4, 2018

हौसला उम्मीदों का .............भारती पंडित


दिखता न हो जब किनारा कोई,
मिलता न हो जब सहारा कोई
जला ले दीया खुद ही की रोशनी का,
कोई तुझसे बढ़कर सितारा नहीं

तूफां तो आए है आते रहेंगे,
ग़मों के अँधेरे भी छाते रहेंगे,
आगाज़ कर रोशनी का कि तुझको, 
अंधेरों की महफ़िल गंवारा नहीं.

माना कि ये इतना आसां नहीं है,
मगर सम्हले गिर के जो इन्सां वहीं है,
तारीके शब में उम्मीदों का परचम ,
कहीं इससे बेहतर नज़ारा नहीं .
-भारती पंडित


Wednesday, October 3, 2018

मुल्क भी हैरान है.......अतुल कन्नौजवी

एक करतब दूसरे करतब से भारी देखकर
मुल्क भी हैरान है ऐसा मदारी देखकर,

जिनके चेहरे साफ दिखते हैं मगर दामन नहीं
शक उन्हें भी है तेरी ईमानदारी देखकर,

उम्रभर जो भी कमाया मिल गया सब खाक में
चढ गया फांसी के फंदे पर उधारी देखकर,

मुल्क के हालात कैसे हैं पता चल जाएगा
देखकर कश्मीर या कन्याकुमारी देखकर,

सर्द मौसम में यहां तो धूप भी बिकने लगी
हो रही हैरत तेरी दूकानदारी देखकर,

इस तरह के नोट चूरन में निकलते थे कभी
सब यही कहते दिखे कल दो हजारी देखकर,

देखने सूरत गया था आइने के सामने
आईना रोने लगा हालत हमारी देखकर।। 
रचनाकार
-अतुल कन्नौजवी

Tuesday, October 2, 2018

हौसला...... प्रीति विकास मोहनानी 'भारती

पागलपन की हद तक सपनों को चाहना।
कुछ नया कर दिखा, दिल यह कह रहा।
क्षितिज तक उड़ान है भरना,
सपनों को साकार है करना।

चाहत ऊँची उड़ान की,
मुश्किल डगर है आसाँ नहीं।
मेहनत से नहीं है डरना,
ख़्वाब को पूरा है करना।

हौसला बुलन्द कर,
गिरने से नहीं है डर।
उठना है थकना नहीं,
उड़ान को क्षितिज तक है पहुँचाना।

ईमानदारी से किया प्रयास,
ख़ुद पर किया गया विश्वास।
कभी व्यर्थ नहीं है जाता,
इक दिन ज़रूर है जिताता।

ख़्वाबों को महसूस कर ,
मंज़िल मिलेगी तुझे,
पंख सभी है फैलाते,
हुनर उड़ने का किसी-किसी को ही आता,
ख़्वाब तो देखते है कई,
हक़ीक़त में कोई-कोई ही ढालता।
-प्रीति विकास मोहनानी 'भारती


Monday, October 1, 2018

ऐ शरीफ़ इंसानों........... साहिर लुधियानवी


खून अपना हो या पराया हो
नस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर,
जंग मशरिक में हो या मगरिब में,
अमन-ऐ-आलम का ख़ून है आख़िर !

बम घरों पर गिरे के सरहद पर , 
रूह-ऐ-तामीर जख्म खाती है !
खेत अपने जले के औरों के ,
ज़ीस्त फ़ाकों से तिलमिलाती है !

टैंक आगे बढ़ें की पीछे हटें,
कोख धरती की बाँझ होती है !
फतह का जश्न हो के हार का सोग,
ज़िंदगी मय्यतों पे रोती है !

जंग तो खुद ही एक मसलआ है
जंग क्या मसअलों का हल देगी ?
आग और ख़ून आज बख्शेगी
भूख और एहतयाज कल देगी ! 

इसलिए ऐ शरीफ इंसानों ,
जंग टलती रहे तो बेहतर है !
आप और हम सभी के आँगन में,
शमा जलती रहे तो बेहतर है 
- साहिर लुधियानवी

शब्दार्थ
नस्ल-ए-आदम = आदम का वशंज, मशरिक = पूर्व दिशा, 
मगरिब = पश्चिम, अम्न-ए-आलम = विश्व शांति, ज़ीस्त = जीवन, फ़ाक़ों = गरीबी / उपवास, एहतियाज = बलिदान