Wednesday, February 7, 2018

नदी......रवीन्द्र प्रभात


उम्र के-
एक पड़ाव के बाद
अल्हड़ हो जाती नदी
ऊँचाई-निचाई की परवाह के बग़ैर
लाँघ जाती परम्परागत भूगोल
हहराती- घहराती
धड़का जाती गाँव का दिल
बेँध जाती शिलाखंडों के पोर -पोर 
अपने सुरमई सौंदर्य, भंवर का वेग
और, विस्तार की स्वतंत्रता के कारण...!

आक्रोशित हो जाती नदी
एक पड़ाव के बाद
जब बर्दाश्त नहीं कर पाती
पुर्वा - पच्छुवा का दिलफेंक अंदाज़
बहक कर बादलों का उमड़ना - घुमड़ना 
और, ठेकेदारों का
बढ़ता हुआ हाथ अपनी ओर
तब, निगल जाती अचानक
सारा का सारा गाँव
व्याघ्रमती की तरह...!

ब्याही जाती नदी
एक पड़ाव के बाद.
जब होता उसे औरत होने का एहसास
ख़ामोश हो जाती वह
भावुकता के हद तक 
समेट लेती ख़ुद को
पवित्रता की सीमा के भीतर
खोंइचा से लुटाती 
कुछ डोमेट-बालू
और निकल जाती
अपने गंतव्य की ओर
पिता शिव को प्रणाम कर...!

समा जाती नदी समुंदर के आगोश में
एक पड़ाव के बाद 
बंद कर लेती किवाड़ यकायक 
छोड़ जाती स्मृतियों के रूप में
अनवरत बहने वाली धाराएँ
और अपना चेतन अवशेष...!

नदी-
एक छोटी सी बच्ची भी है
युवती भी/ माँ भी
और, एक पूरा जीवन बोध भी...!

-रवीन्द्र प्रभात

Tuesday, February 6, 2018

बात घर की रही नहीं घर की........निर्मला कपिला

मेरी शोहरत उड़ान तक पहुँची
फिर अना भी उफान तक पहुँची

बोझ घर का जो उम्र भर ढोया
ज़िंदगी अब थकान तक पहुँची

अब न दूंगा उधार लिक्खा था
मुफलिसी जब दुकान तक पहुँची

मैं बुरा था कसूर घर का क्या
बात जो खानदान तक पहुँची

खौफ पाया अँधेरों' का दिल में
तीरगी जब मकान तक पहुंचा

जिक्र उसका हो शायरी में जब 
वो ग़ज़ल आसमान तक पहुँची

नफरतों का शरर उठा कैसे
आग हिन्दोस्तान तक पहुँची

फ़ैली अफवाह रफ्ता रफ्ता वो
बात जब थी जुबान तक पहुँची

बात घर की रही नहीं घर की
घर से निकली जहान तक पहुँची

पाँव उखड़े नहीं जमीं से भी
जब थी मैं आसमान तक पहुंची

तब तो लगता कसूर आशिक का
जब मुहब्बत ही जान तक पहुँची

- निर्मला कपिला

Monday, February 5, 2018

नई पीढ़ी की पाठकीय आकांक्षाएँ....ऋचा वर्मा

पॉपुलर बनाम क्लासिक की बहस
एक नया फिनोमिना है
बाज़ार तूलिका मापेगी उसे

कोई भी रोमांचक भाव रह-रहकर कर उभरेगा
अथवा
मनोरंजन की क्षमता बलवती होगी
कि सहसा बह उठेगी 'यो-यो' की बहार..

तब 'बुद्धिजीवी युवा पाठक'
जीवन-दर्शन की इस नई धुन को
स्वागत योग्य कहेगा
और नकार देगा
'शुद्धतावाद' को

जब बयार थम जाएगी
तब फिर से
ग्लोबलाइज़ेशन के फ़ायदे गिनाने वाली पॉपुलैरिटी
ढूँढ़ेगी इतिहास में अपने अस्तित्व को
पर चेतना की नई परतों और नए आयामों में
गुम मिलेगी
पॉपुलर बनाम क्लासिक की बहस

चूँकि महज़ एक बड़ा भ्रम है बाज़ार
श्रेष्ठता का मापदंड नहीं..।

-ऋचा वर्मा

Sunday, February 4, 2018

हुई सुबह मुट्ठी में भर लेंगे नया आकाश ....श्रीमती मधु सिंघी

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हुई सुबह 
मुट्ठी में भर लेंगे 
नया आकाश । 

उषा किरण 
होता नव सृजन
मन प्रसन्न । 

मुझमें बेटी 
सदा प्रतिबिंबित 
छवि इंगित ।

तपती धूप
वृक्ष की घनी छाँव 
देती ठंडक ।

सजाई अर्थी 
राग ,द्वेष व दंभ/ 
सधा जीवन । 

प्रीत के रंग 
अपनों का हो संग
मन मृदंग। 

-श्रीमती मधु सिंघी, 
हाइकु कवयित्री 
प्रस्तुति:- प्रदीप कुमार दाश "दीपक"

Saturday, February 3, 2018

क्योंकि मन जिंदा है.....स्मृति आदित्य


मन परिंदा है 
रूठता है 
उड़ता है 
उड़ता चला जाता है 
दूर..कहीं दूर 
फिर रूकता है 
ठहरता है, सोचता है, आकुल हो उठता है 
नहीं मानता 
और लौट आता है 
फिर... 
फिर उसी शाख पर 
जिस पर विश्वास के तिनकों से बुना 
हमारा घरौंदा है
मन परिंदा है 
लौट-लौट कर आएगा तुम्हारे पास 
तुम्हारे लिए...क्योंकि मन जिंदा है!

- स्मृति आदित्य

Friday, February 2, 2018

ताँका.....डॉ. सुरंगमा यादव

निज शक्ति का
हनुमत को जब 
हुआ आभास
पल में लाँघ लिया 
निस्सीम पारावार ।
..................
प्रकृति सदा 
निरत रहती है 
निज कार्यों में 
मनुज होकर तू
व्यर्थ वक़्त बिताये।
...................
पथ बाधा से 
विचलित होकर 
जीवन व्यर्थ 
सच्चा मनुज वही 
जो करता संघर्ष।
-डॉ. सुरंगमा यादव

Thursday, February 1, 2018

एक इंद्रधनुषी स्वप्निल रंगीला बचपन....कुसुम कोठारी

ख्वाबों के दयार पर एक झुरमुट है यादों का
एक मासूम परिंदा फुदकता यहाँ वहाँ यादों का ।

सतरंगी धागों का रेशमी इंद्रधनुषी शामियाना
जिसके तले मस्ती में झूमता एक भोला बचपन ।

सपने थे सुहाने उस परी लोक की सैर के 
वो जादुई रंगीन परियां जो डोलती इधर उधर।

मन उडता था आसमानों के पार कहीं दूर 
एक झूठा सच, धरती आसमान है मिलते दूर ।

संसार छोटा सा लगता ख्याली घोड़े का था सफर 
एक रात के बादशाह बनते रहे संवर संवर ।

दादी की कहानियों मे नानी थी चांद के अंदर 
सच की नानी का चरखा ढूढते नाना के घर ।

वो झूठ भी था सब तो कितना सच्चा था बचपन
ख्वाबों के दयार पर एक मासूम सा बचपन।

एक इंद्रधनुषी स्वप्निल रंगीला  बचपन। 

-कुसुम कोठारी।