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Friday, July 19, 2019

आँखों की अनदेखी लिपियाँ..रश्मि शर्मा


कही तुमने 
बार-बार वो बातें
जिनका मेरे लिए
न कोई अर्थ है
ना ही अस्तित्व

जो मैं पढ़ना चाहूँ
तुम्हारी आँखों की 
अनदेखी लिपियाँ
कहो, कौन सी कूट का
इस्‍तेमाल करूं !

ढूंढ रही हूँ 
कोई ऐसा स्रोत
ऐसी किताब
जो नयनों की भाषा को
शब्‍दों में बदलती हो

है ये ईसा पूर्व की, या
सोलहवीं सदी 
की सी बात
कि हमारे बीच से
शब्‍द अदृश्‍य ही रहे हैं

अब तुम पढ़ना
मेरा मौन, देखना 
मेरी अनवरत प्रतीक्षा
अब मैं कूट-लिपिक बन
पढूंगी बस
आँखों की अनदेखी लिपियाँ...। 

-रश्‍मि शर्मा
मूल रचना