आईन तो हम रोज़ बदल सकते हैं
अख़लाक़ में तरमीम नहीं हो सकती
हम रोज़ नए मुल्क बना सकते हैं
तहज़ीब की मगर तक़सीम नहीं हो सकती
साहिर की जुबां, ज़ार की बोली मेरी
साएल ने सिखाया है अदब का असलूब
कैफ़ी से तलम्मुज़ का शरफ़ रखता हूँ
उर्दू के सिवा कुछ नहीं मुझे मतलूब
नाकर्दा गुनाहों की जज़ा जब देगा
मांगूंगा सर-ए-हश्र, खुदा से उर्दू
गुलज़ार, आबरू ए ज़बाँ अब हमीं से है
दिल्ली में अपने बाद ये लुत्फ़-ए-सुखन कहाँ!
-गुलज़ार देहलवी
7 July 1926 – 12 June 2020

