अच्छी थी, पगडंडी अपनी
अच्छी थी, पगडंडी अपनी
सड़कों पर तो, जाम बहुत है।।
फुर्र हो गई फुर्सत, अब तो।
सबके पास, काम बहुत है।।
नहीं जरूरत, बूढ़ों की अब।
हर बच्चा, बुद्धिमान बहुत है।।
उजड़ गए, सब बाग बगीचे।
दो गमलों में, शान बहुत है।।
मट्ठा, दही, नहीं खाते हैं।
कहते हैं, जुकाम बहुत है।।
पीते हैं, जब चाय, तब कहीं।
कहते हैं, आराम बहुत है।।
बंद हो गई, चिट्ठी, पत्री।
व्हाट्सएप पर, पैगाम बहुत है।।
आदी हैं, ए.सी. के इतने।
कहते बाहर, घाम बहुत है।।
झुके-झुके, स्कूली बच्चे।
बस्ते में, सामान बहुत है।।
नहीं बचे, कोई सम्बन्धी।
अकड़,ऐंठ,अहसान बहुत है।!
सुविधाओं का, ढेर लगा है।
पर इंसान, परेशान बहुत है।।
वाह!! कितने सरल और सुंदर शब्दों में वर्तमान हालात का सजीव चित्रण कर दिया है आपने
ReplyDeleteवाह
ReplyDeleteबेहतरीन
ReplyDeleteपगडंडी से लेकर व्हाट्सएप तक का सफर आप बहुत सहज ढंग से दिखाते हैं। हर पंक्ति पढ़ते हुए मैं अपने आसपास की तस्वीर देखता हूँ। सुविधाएँ बढ़ीं, पर रिश्ते और सुकून घटे, यह बात आप साफ़ रख देते हैं। बूढ़ों की अनदेखी और बच्चों का बोझ दिल को छू जाता है। भाषा सीधी है, पर असर गहरा है।
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