Sunday, February 19, 2017

हाँ मैं प्रवासी हूँ …मंजू मिश्रा


हाँ 
मैं प्रवासी हूँ 
शायद इसी लिए
जानता हूँ
कि मेरे देश की
माटी में
उगते हैं रिश्ते 
*
बढ़ते हैं
प्यार की धूप में
जिन्हें बाँध कर
हम साथ ले जाते हैं
धरोहर की तरह
और पोसते हैं उनको
कलेजे से लगाकर 
*
क्योंकि घर के बाहर
हमें धन, वैभव,
यश और सम्मान
सब मिलता है,
नहीं मिलती तो
रिश्तों की
वो गुड़ सी मिठास
जो अनगढ़ भले ही हो
लेकिन होती
बहुत अनमोल है 
*
हाँ मैं प्रवासी हूँ
-मंजू मिश्रा

Saturday, February 18, 2017

बादशाह पर जुर्माना...डॉ. रश्मि शील

एक बार रात्रि के समय बादशाह औरंगज़ेब सोने ही जा रहे थे कि शाही घंटी बज उठी। बादशाह शयनकक्ष से बाहर आये। उन्हें एक दासी आती दिखाई दी। वह बोली, ''हुज़ूरे आलम! क़ाज़ी साहब आलमपनाह से मिलने के लिए दीवान खाने में तशरीफ़ लाये हैं और आपका इन्तज़ार कर रहे हैं।"
औरंगज़ेब फ़ौरन दीवानखाने पहुँचे। क़ाज़ी ने उन्हें बताया, "जहांपनाह, गुजरात जिले के अहमदाबाद शहर के एक मुहम्मद मोहसीन ने उन पर पाँच लाख रुपयों का दावा ठोंका है। अतः कल आपको दरबार में हाज़िर होना होगा।" क़ाज़ी के चले जाने पर औरंगज़ेब विचार करने लगा कि उसने तो किसी से पाँच लाख रुपए उधार नहीं लिए हैं। स्मरण करने पर भी उसे याद नहीं आया। इतना ही नहीं, मुहम्मद मोहसीन नामक व्यक्ति को भी वह न पहचानता था।
दूसरे दिन दरबार लगा और मुज़रिम के रूप में औरंगज़ेब हाज़िर हुआ। सारा दरबार खचाखच भरा हुआ था और तिल रखने को भी जगह न थी। औरंगज़ेब को उसके जुर्म का ब्यौरा पढ़कर सुनाया गया।
बात यह थी कि औरंगज़ेब के भाई मुराद को गुजरात जिला सौंपा गया था। शाहजहां जब बीमार पड़ा तो उसने स्वयं को ही गुजरात का शासक घोषित कर दिया। उसे स्वयं के नाम के सिक्के जारी करने के लिए धन की ज़रूरत हुई तब उसने मुहम्मद मोहसीन से पाँच लाख रुपए उधार लिए थे। इस बीच औरंगज़ेब ने हिकमत करके शाहजहां को क़ैद कर लिया तथा अपने तीनो भाइयों- मुराद, दारा और शुजा को क़त्ल कर उन तीनो की संपत्ति अपने ख़ज़ाने में जमा कर ली। इस तरह मोहसीन से लिया गया धन भी उसके ख़ज़ाने में जमा हो गया।
औरंगज़ेब ने अपने अपराध के प्रति अनभिज्ञता ज़ाहिर की। मोहसीन ने अपने पास मौज़ूद दस्तावेज़ दिखाया। औरंगज़ेब ने जुर्म क़ुबूल कर लिया और शाही ख़ज़ाने से पाँच लाख रुपए निकलवा कर जुर्माना अदा किया।


-डॉ. रश्मि शील

Friday, February 17, 2017

और क्या चाहिये बसर के लिये.........ऋतु कौशिक

चल पड़े हम उसी सफ़र के लिये
वो ही मंज़िल उसी डगर के लिये

जिसके साये में मिट गई थी थकन
मैं हूँ बेताब उसी शजर के लिये

चंद रिश्ते दिलों के थोड़ी ख़ुशी 
और क्या चाहिये बसर के लिये

पक के गिरने की राह देखी सदा
पास पत्थर तो था समर के लिये

हर जगह रोशनी हुई है मगर
शब अँधेरी है खँडहर के लिये।


-ऋतु कौशिक

ritukaushiktanu@gmail.com

Thursday, February 16, 2017

मग़रूर तेरी राहें.....मनजीत कौर


मग़रूर तेरी राहें
किस तौर फिर निबाहें

मशगूल तुम हुए हो
महरूम मेरी चाहें

तुम पास गर जो होते
महफूज़ थीं फ़िज़ाएँ

किससे गिला करें अब
मायूस मेरी आहें

बदली है चाह इनमें
मख़्मूर जो निगाहें

तुम जो जुदा हुए हो
महदूद मेरी राहें

टूटा हुआ ये दिल है
तस्की इसे दिलाएँ।

-मनजीत कौर

Wednesday, February 15, 2017

Conversion of Rice straw into houses

आज कोई कविता नहीं पर एक वीडियो शेयर करना चाहती हूँ
जिसमें यह बताया गया है कि
धान के पौधे से धान अलग करने के पश्चात
जो पैरा बचता है वह अपने यहाँ पशु आहार के रूप में उपयोग में लाते है
पर विदेशों में इसका उपयोग कुछ इस तरह से किया जाता है
कृपया देखें...

Conversion of Rice straw into houses

Tuesday, February 14, 2017

तुम भी न बस कमाल हो....डॉ. जेन्नी शबनम
















धत्त! 
तुम भी न 
बस कमाल हो! 
न सोचते 
न विचारते 
सीधे-सीधे कह देते 
जो भी मन में आए 
चाहे प्रेम 
या ग़ुस्सा 
और नाराज़ भी तो बिना बात ही होते हो 
जबकि जानते हो 
मनाना भी तुम्हें ही पड़ेगा 
और ये भी कि 
हमारी ज़िन्दगी का दायरा 
बस तुम तक 
और तुम्हारा 
बस मुझ तक 
फिर भी अटपटा लगता है 
जब सबके सामने 
तुम कुछ भी कह देते हो 
तुम भी न 
बस कमाल हो!
-डॉ. जेन्नी शबनम
jenny.shabnam@gmail.com

Monday, February 13, 2017

फागुन.... संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'



पहाड़ों पर टेसू ने रंग बिखेरे फागुन में 
हर कदम पर बज रहे ढोल फागुन में
ढोल की थाप पे थिरकते पैर फागुन में
महुआ लगे झुमने गीत सुनाए फागुन में  

बिन पानी खिल जाते टेसू फागुन में 
पानी संग मिल रंग लाते टेसू फागुन में 
रंगों के खेल हो जाते शुरू फागुन में 
दुश्मनी छोड़ दोस्ती के मेल होते फागुन में  

शरमाते जाते हैं सब मौसम फागुन में 
मांग ले जाते प्रेमी कुछ प्यार फागुन में 
हर चहरे पर आ जाती खुशहाली फागुन में 
भगोरिया के नृत्य लुभा जाते फागुन में  

बांसुरी, घुंघरू के संग गीत सुनती फागुन में 
ताड़ों के पेड़ों से बन जाते रिश्ते फागुन में 
शकर के हर-कंगन बन जाते मेहमां फागुन में 
पहाड़ों की सचाई हमसे होती रूबरू फागुन में  

-संजय वर्मा 'दृष्ट‍ि'

Sunday, February 12, 2017

वृद्धाश्रम‌....प्रभुदयाल श्रीवास्तव



दुर्बल-निर्बल जेठे-स्याने,
वृद्धाश्रम में रहते क्यों हैं?
दूर हुए क्यों परिवारों से,
दु:ख तकलीफें सहते क्यों हैं?  

इनके बेटे, पोते, नाती,
घर में पड़े ऐश करते हैं,
और जमाने की तकलीफें,
ये बेचारे सहते क्यों हैं?  

इन सबने बच्चों को पाला,
यथायोग्य शिक्षा दी है,
ये मजबूत किले थे घर के,
टूट-टूट अब ढहते क्यों हैं?  

इसका उत्तर सीधा-सादा,
पश्चिम का भारत आना है,
पश्चिम ने तो मात-पिता को,
केवल एक वस्तु माना है। 

चीज पुरानी हो जाने पर,
उसको बाहर कर देते हैं,
इसी तरह से मात-पिता को,
वृद्धाश्रम में धर देते हैं।  

-प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Saturday, February 11, 2017

वो चूल्हा.............शबनम शर्मा










घर में दूध की ज़रूरत 
रात का समय 
सोचा घूम भी आऊँ
व जुम्मन काका के 
घर से ले आऊँ लोटा भर दूध, 

पहुँची वहाँ, खटखटाया बाहर 
का दरवाज़ा, 
छोटी बालिका ने खोला, 
लिवा गई मुझे अन्दर 
बड़े से आँगन में,
देख मुझे जुम्मन काका खड़े हुए 
कारण पूछ आने का, कर 
इशारा बेगम को मेरे पास 
बैठ गये 

हैरान थी मैं देख, 
सब बैठे थे चूल्हे के इर्द-गिर्द,
बच्चे चबा रहे थे दाने, 
भून रहे थे आलू, 
बुजुर्ग सेंक रहे थे आग, 
पर सब ख़ुश,
बतिया रहे थे, 
कि इक ख़्याल ने मुझे 
झकझोर दिया, 

कितनी ताक़त है इस 
चूल्हे में,
इसने जोड़ा है मुन्नी 
से दादा तक इक ही 
डोर में सबको।
-शबनम शर्मा
shabnamsharma2006@yahoo.co.in

Friday, February 10, 2017

भौंरे गाते हैं नया गान...कवि सोहनलाल द्विवेदी


आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौंरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत। 

-कवि सोहनलाल द्विवेदी 

Thursday, February 9, 2017

कभी कभी बहुत अच्छा लगता है...निधि सक्सेना

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कभी कभी अच्छा लगता है
उस नदी को देखना
जो बही जा रही हो किनारे तोड़
उद्दाम 
रौद्र 
प्रचंड
बेलौस
बगैर किसी आशंका
बगैर किसी धारणा के!!
निर्बाध निर्भीक
परम्पराएँ ढहाती
हर व्यवस्था भंग करती
अपनी धारायें स्वयं बनाती!!
कभी कभी अच्छा लगता है
उसका यूँ जता देना
कि मेरी सहृदयता का अनुचित लाभ न उठाओ
कि मेरा सम्मान करो
कि शक्तिस्तोत्र मैं हूँ
और तुम नगण्य!!
कि प्रार्थना मैं हूँ 
और तुम प्रार्थी !!
कि अंतिम निर्णायक मैं हूँ
और तुम मात्र दर्शक!!
और कभी कभी बहुत अच्छा लगता है
ऐसी किसी नदी में अपना बिम्ब तलाशना!!
~निधि~

Wednesday, February 8, 2017

मेरा एतबार बोलता है.....राहत इंदौरी

मेरा ज़मीर, मेरा एतबार बोलता है
मेरी ज़बान से परवरदिगार बोलता है

तेरी ज़बान कतरना बोहत ज़रूरी है
तुझे मर्ज़ है कि तू बार बार बोलता है

कुछ और काम उसे आता ही नहीं शायद
मगर वोह झूट बोहत ही शानदार बोलता है


Tuesday, February 7, 2017

प्यार में रस्साकसी....प्राण शर्मा


नित नयी नाराज़गी अच्छी नहीं
प्यार में रस्साकसी अच्छी नहीं

दिल्लगी जिंदादिलों से कीजिये
दिलजलों से दिल्लगी अच्छी नहीं

एक रब हैऔर हैं मजहब कई
बात दुनिया में यही अच्छी नहीं

ज़िन्दगी है,ज़िन्दगी में दोस्तो
हर घड़ी संजीदगी अच्छी नहीं

`प्राण` मिलते हैं कहाँ ये रोज़-रोज़
दोस्तों से दुश्मनी अच्छी नहीं
-प्राण शर्मा

Monday, February 6, 2017

मुझे क्यों सदा दी गई थी....


भड़कने की पहले दुआ दी गई थी।
मुझे फिर हवा पर हवा दी गई थी।

मैं अपने ही भीतर छुपा रह गया हूं,
ये जीने की कैसी अदा दी गई थी।

बिछु्ड़ना लिखा था मुकद्दर में जब तो,
पलट कर मुझे क्यों सदा दी गई थी।

अँधेरों से जब मैं उजालों की जानिब
बढा़, शम्मा तब ही बुझा दी गई थी।

मुझे तोड़ कर फिर से जोडा़ गया था,
मेरी हैसियत यूं बता दी गई थी।

सफर काटकर जब मैं लौटा तो पाया,
मेरी शख्सियत ही भुला दी गई थी।

गुनहगार अब भी बचे फिर रहे हैं,
तो सोचो किसे फिर सज़ा दी गयी थी। 


-कृष्ण सुकुमार

Sunday, February 5, 2017

कब हमने सोचा था.....आशा जोगलेकर

कब हमने सोचा था कि ये पैर डगमगायेंगे,
बेटे हमारे लिये फिर लाठी ले के आयेंगे।

खाना बनाने से भी हम इतने थक जायेंगे
सीढी बिना रेलिंग की कैसे हम उतर पायेंगे।

लेकिन ये हुआ है तो अब मान भी हम जायेंगे
जो जो सहारा लेना है लेकर उसे निभायेंगे।

मन माफिक खाना पीना भी भूल जायेंगे,
सरे शाम ही अब खाने से निपट जायेंगे।

हलका फुलका और दाल से निभायेंगे,
एक ही काफी है अब दो कहाँ खा पायेंगे।

घूमने जाना तो फिर कोई साथ ले के जायेंगे
अकेले से तो जानें की हिम्मत क्या बटोर पायेंगे।



Saturday, February 4, 2017

पतंग उड़ी है बसंत में......प्राण शर्मा


खुशबू भरी बयार बही है बसंत में
फूलों की ख़ूब धूम मची है बसंत में

फूलों के जेवरों से सजी है बसंत में
हर वाटिका दुल्हन सी बनी है बसंत में

आओ चलें बगीचे में कुछ वक़्त के लिए
क्या गुनगुनी सी धूप खिली है बसंत में

उस शोखी का जवाब नहीं दोस्तो कहीं
जिस शोखी में पतंग उड़ी है बसंत में

कम्बल,रजाइयों की ज़रुरत नहीं रही
सर्दी की लहर लौट गई है बसंत में

कण-कण धरा का आज हुआ स्वर्ण की तरह
ये किसकी `प्राण` जादूगरी है बसंत में

-प्राण शर्मा



Friday, February 3, 2017

सूर्य उत्तरायण हुए...इन्दु पाराशर

'लोहड़ी' 'पोंगल' जा चुके
गई मकर संक्रान्ति।
सूर्य उत्तरायण हुए,
होगी शीत समाप्ति।।

नूतन किसलय बांचती,
परिवर्तन का मंत्र। 
कण-कण, तृण-तृण छा रहा,
है ऋतुराज वसंत।।
गेंदे और गुलाब भी,
शिशुओं सो मुस्काए।
किंशुक तरु आतुर खड़ा,
सौ आरती सजाए।।
पशु-पक्षी हर्षित हुए,
आया देख वसंत।
पीली सरसों खिल उठी,
'केकी' हृदय उमंग।।
रंग-बिरंगी तितलियां,
उड़ती है स्वच्छंद।
पागल-प्रेमी भ्रमर भी,
लूट रहे मकरंद।।

बौराए से आम हैं,
कोयल छेड़े तान।
मदमाते महुए झरे,
मन बिकता बेदाम।।

सोने सी बाली पकी,
हर्षित हुआ किसान।
'बेटी ब्याही जाएगी',
मन में है अरमान।।

'बीहू' 'बैसाखी' मनी,
'रबी' फसल के पर्व।
मन 'अनंग' संग गा रहै,
है सबके मन का गर्व।।
मन फागुन-फागुन होगा,
आएगा 'होली' का त्योहार।
सतरंगे रंग बरसेंगे
हर आंगन हर द्वार।।

-इन्दु पाराशर