Saturday, December 31, 2016

वह साल गया, यह साल चला.....हरिवंशराय बच्चन

मित्रों ने हर्ष-बधाई दी
मित्रों को हर्ष-बधाई दी
उत्तर भेजा, उत्तर आया
'नूतन प्रकाश', 'नूतन प्रभात'
इत्यादि शब्द कुछ दिन गूंजे
फिर मंद पडे, फिर लुप्त हुए
फिर अपनी गति से काल चला;
वह साल गया, यह साल चला।

आने वाला 'कल' 'आज' हुआ,
जो 'आज' हुआ वो 'कल' कहलाया
पृथ्वी पर नाचे रात-दिवस,
नभ में नाचे रवि-शशि-तारे.
निश्चित गति रखकर बेचारे।
यह मास गया, वह मास गया,
ऋतु-ऋतु बदली,मौसम बदला;
वह साल गया, यह साल चला।

झंझा-सनसन. घन-घन-गर्जन,
कोकिल - कूजन, केकी - क्रंदन,
अखबारी दुनिया की हलचल,
संग्राम - संधि. दंगा - फसाद,
व्याख्यान विविध चर्चा-विवाद
हम-तुम यह कह कर भूल गए,
वह बुरा हुआ, यह भला हुआ;
वह साल गया, यह साल चला।

-हरिवंशराय बच्चन
......मधुरिमा से

Friday, December 30, 2016

सब जीवन बीता जाता है.....जयशंकर प्रसाद

धूप छांह खेल सदृश
सब जीवन बीता जाता है

समय भागता प्रतिक्षण में,
नव-अतीत के तुषार-कण में
हमें लगाकर भविष्य-रण में
आप कहां छिप जाता है
सब जीवन बीता जाता है.

बुल्ले, नहर, हवा के झोंके
मेघ और बिजली के टोंके,
किसका साहस है कुछ रोके,
जीवन का वह नाता है
सब जीवन बीता जाता है

वंशी को बज जाने दो
मीठी मीड़ों को आने दो
आंख बंद करके गाने दो
जो कुछ हमको आता है

सब जीवन बीता जाता है
-जयशंकर प्रसाद

Thursday, December 29, 2016

थोड़ी मरम्मत का जरूरत है....निदा फ़ाज़ली


बहुत मैला है ये सूरज
किसी दरिया के पानी में
उसे धोकर फिर सुखाएँ फिर
गगन में चांद भी 
कुछ धुंधला-धुंधला है
मिटा के उसके सारे दाग़-धब्बे
जगमगाएं फिर
हवाएं सो रही है
पर्वतों पर पांव फैलाए
जगा के उनको नीचे लाएँ
पेड़ों में बसाएँ फिर
धमाके कच्ची नींदों में
डरा देते हैं बच्चों को
धमाके ख़त्म करके
लोरियों को गुनगुनाए फिर
वो जबसे साथ है
यूं लग रहा है
अपनी ये दुनिया है
जो सदियों की विरासत है
जो हम सबकी अमानत है
इसमें अब
थोड़ी मरम्मत का जरूरत है
-निदा फ़ाज़ली

अपने शेरों में ताज़गी रखना.....चाँद शेरी

अपने जीवन में सादगी रखना
आदमियत की शान भी रखना

डस न ले आस्तीं के सांप कहीं
इन से महफ़ूज़ ज़िंदगी रखना

हों खुले दिल तो कुछ नहीं मुश्किल
दुश्मनों से भी दोस्ती रखना

मुस्तक़िल रखना मंज़िले-मक़सूद
अपनी मंज़िल न आरज़ी रखना

ए सुख़नवर नए ख्यालों की
अपने शेरों में ताज़गी रखना

अपनी नज़रों के सामने ‘शेरी’
‘मीरो-ग़ालिब’ की शाइरी रखना
-चाँद शेरी

Wednesday, December 28, 2016

कुछ ईमानदार से शब्द.....सीमा "सदा" सिंघल


कुछ ईमानदार से शब्द
मेरी कलम से जब भी उतरते
मुझे उन शब्दों पर बस
फ़ख्र करने का मन करता
ईमानदारी व्यक्तित्व की हो या फिर
शब्दों की हमेशा प्रेरक होती है
व्यक्तित्व अनुकरणीय होता है
और शब्द विस्मरणीय !
....
ऐसे ही सहानुभूति भरे शब्द
कभी जब वक़्त बुरा होता है
हालातों से
समझौता करने की बात होती है
तो ये शब्द कब हौसला बन जाते हैं
पता भी नहीं चलता
सिर पर आशीष बन ठहर जाते हैं !!
...
चुनौतियां सबके जीवन में आती हैं
हाँ उनसे कोई सबक लेता है
तो कोई उन्हें आड़े हाथों लेता है
या फिर करता है कोई
उनसे जीतने के लिए संघर्ष !!!

-सीमा "सदा" सिंघल

Tuesday, December 27, 2016

केसरिया मन हो....निधि सक्सेना












हर रात बिखर जाते हो मेरे आँगन
तुम्हारे ख्यालों में डूबी मैं
सकुचाई उंगलिओं से
हर भोर तुम्हें चुनती हूँ ..
देखो कैसे सिमट आये हो तुम
मेरी अंजलि में..
तुम्हें अपने आँचल में छिपा
मैं आहिस्ता आहिस्ता
आँखे चुराकर
कान्हा के पार्श्व से गुज़रती हूँ..
कि कहीं उनकी मोहक छवि,
मनोहारी मुस्कान
और बाँसुरी के सम्मोहन से बाध्य हो
मैं तुम्हें उनके चरणों में अर्पित न कर दूँ..
सजाया है तुम्हें यहाँ
अपनी कविताओं के मध्य
कि तुम उनकी महक हो
अनायास बहती नमी हो
केसरिया मन हो..
मेरी हर अनुभूति के साक्ष्य
तुम मेरे आँगन के हरसिंगार हो..
~निधि सक्सेना

Monday, December 26, 2016

दिसंबर का महीना............ निशा माथुर 










वो अटके से ठहरे-ठहरे से जज्बात,
लबों पे रूकते लफ्जों की बंदिश।
दिल में खलिश-सी तेरी मौजूदगी और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

कोहरे की चादर में लिपटे कुछ ख्याल, 
धुंध में धुंधलाता सर्द-सा तेरा अक्स।
बिछुड़े को ढूंढता पागल दिल और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।

वो कुनमुनी धूप में आंखों से झरते मोती,  
पलकों के कोरों से समेटती कुछ आहें।
बदन पे लपेटे तेरी खुश्बू का लिबास और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

तेरी यादों की वो जानलेवा अंगड़ाई, 
तुझे ही सोचना, लिखना और गुनगुनाना।
चांदनी-सी खिलती कमसिन हंसी और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

तेरी बातों-बातों में आंचल की नरमी, 
कानों को छूकर निकलता रूहानी स्पर्श।
रंगीन हो जाते स्याही के स्याह रंग और
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

तेरी निगाहों की मीठी-सी शरारत,
मेरे चेहरे से उलझती जाती-सी नजर।
फिर तेरा नेह बनकर यूं बरसना और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना।  

वो बर्फ-सी जम-जम जाती सांसें, 
पिघलती-सी ठहरी-ठहरी शमा-सी मैं।
कंपकपाता, ठिठुरता-सा रोम-रोम और, 
उफ ! ये दिसंबर का महीना।

तेरी चाहतों का ओढ़ कर आसमान,
अपने अरमानों का सुलगा कर अलाव।
सेंक लूं वेणी में गुंथी हुई कुछ उम्मीदें और.....
उफ ! ये दिसंबर का महीना। 

-निशा माथुर    

Sunday, December 25, 2016

निराशा को हावी न होने दे.....प्रेरक कथा


एक राजा के पास कई हाथी थे, लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली था,
बहुत आज्ञाकारी, समझदार व युद्ध-कौशल में निपुण था।

बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय दिलाकर वापस लौटा था, इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था।

समय गुजरता गया  ...

और एक समय ऐसा भी आया, जब वह वृद्ध दिखने लगा। अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर पाता था। इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में भी नहीं भेजते थे।

एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, लेकिन वहीं कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया। उस हाथी ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया।

उसकी चिंघाड़ने की आवाज से लोगों को यह पता चल गया कि वह हाथी संकट में है। हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा। राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास इक्कठा हो गए और विभिन्न प्रकार के शारीरिक प्रयत्न उसे निकालने के लिए करने लगे।

जब बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत कोई मार्ग नहीं निकला तो राजा ने अपने सबसे अनुभवी मंत्री को बुलवाया।

मंत्री ने आकर घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ।

सुनने वालोँ को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा, जो अनेक व्यक्तियों के शारीरिक प्रयत्न से बाहर निकल नहीं पाया।

आश्चर्यजनक रूप से जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा।

पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया।
अब मंत्री ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी।

हाथी की इस कहानी से यह स्पष्ट होता है कि यदि हमारे मन में एक बार उत्साह – उमंग जाग जाए तो फिर हमें कार्य करने की ऊर्जा स्वतः ही मिलने लगती है और कार्य के प्रति उत्साह का मनुष्य की उम्र से कोई संबंध नहीं रह जाता।


जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखे और निराशा को हावी न होने दे।

कभी – कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति 
यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, 
लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है।

संकलित... व्हाट्सएप्प से

Saturday, December 24, 2016

कभी इससे मेरी भी दोस्ती थी.... फिराक गोरखपुरी



यूँ माना ज़ि‍न्दगी है चार दिन की 
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी

ख़ुदा को पा गया वायज़ मगर है 
ज़रूरत आदमी को आदमी की 

बसा-औक्रात1 दिल से कह गयी है 
बहुत कुछ वो निगाहे-मुख़्तसर भी 

मिला हूँ मुस्कुरा कर उससे हर बार 
मगर आँखों में भी थी कुछ नमी-सी 

महब्बत में करें क्या हाल दिल का 
ख़ुशी ही काम आती है न ग़म की 

भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर 
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली 

लड़कपन की अदा है जानलेवा 
गज़ब ये छोकरी है हाथ-भर की

है कितनी शोख़, तेज़ अय्यामे-गुल2 पर 
चमन में मुस्कुहराहट कर कली की 

रक़ीबे-ग़मज़दा3 अब सब्र कर ले 
कभी इससे मेरी भी दोस्ती थी 
फिराक गोरखपुरी 

1- कभी-कभी, 2- बहार के दिन, 3- दुखी प्रतिद्वन्द्वी 


Friday, December 23, 2016

शैल चतुर्वेदी.... याद ही शेष है

शैल चतुर्वेदी
29 जून 1936 -29 अक्टूबर 2007
आप हिंदी के प्रसिद्ध हास्य कवि, गीतकार 
और बॉलीवुड के चरित्र अभिनेता थे।


प्रस्तुत है उनकी एक व्यंग्य कविता

हमनें एक बेरोज़गार मित्र को पकड़ा
और कहा, "एक नया व्यंग्य लिखा है, सुनोगे?"
तो बोला, "पहले खाना खिलाओ।"
खाना खिलाया तो बोला, "पान खिलाओ।"
पान खिलाया तो बोला, "खाना बहुत बढ़िया था
उसका मज़ा मिट्टी में मत मिलाओ।
अपन ख़ुद ही देश की छाती पर जीते-जागते व्यंग्य हैं
हमें व्यंग्य मत सुनाओ
जो जन-सेवा के नाम पर ऐश करता रहा
और हमें बेरोज़गारी का रोजगार देकर
कुर्सी को कैश करता रहा।

व्यंग्य उस अफ़सर को सुनाओ
जो हिन्दी के प्रचार की डफली बजाता रहा
और अपनी औलाद को अंग्रेज़ी का पाठ पढ़ाता रहा।
व्यंग्य उस सिपाही को सुनाओ
जो भ्रष्टाचार को अपना अधिकार मानता रहा
और झूठी गवाही को पुलिस का संस्कार मानता रहा।
व्यंग्य उस डॉक्टर को सुनाओ
जो पचास रूपये फ़ीस के लेकर
मलेरिया को टी०बी० बतलाता रहा
और नर्स को अपनी बीबी बतलाता रहा।

व्यंग्य उस फ़िल्मकार को सुनाओ
जो फ़िल्म में से इल्म घटाता रहा
और संस्कृति के कपड़े उतार कर सेंसर को पटाता रहा।
व्यंग्य उस सास को सुनाओ
जिसने बेटी जैसी बहू को ज्वाला का उपहार दिया
और व्यंग्य उस वासना के कीड़े को सुनाओ
जिसने अपनी भूख मिटाने के लिए
नारी को बाज़ार दिया।
व्यंग्य उस श्रोता को सुनाओ
जो गीत की हर पंक्ति पर बोर-बोर करता रहा
और बकवास को बढ़ावा देने के लिए
वंस मोर करता रहा।

व्यंग्य उस व्यंग्यकार को सुनाओ
जो अर्थ को अनर्थ में बदलने के लिए
वज़नदार लिफ़ाफ़े की मांग करता रहा
और अपना उल्लू सीधा करने के लिए
व्यंग्य को विकलांग करता रहा।

और जो व्यंग्य स्वयं ही अन्धा, लूला और लंगड़ा हो
तीर नहीं बन सकता
आज का व्यंग्यकार भले ही "शैल चतुर्वेदी" हो जाए
'कबीर' नहीं बन सकता।


-  शैल चतुर्वेदी


प्राप्ति स्रोत

Thursday, December 22, 2016

पूछा नहीं परिंदो से..........के वाणिका 'दीप'


अमन-चैन को रोज उड़ाते, 
पूछा नहीं परिंदो से
कि जग में है जीते कैसे 
पूछा नहीं परिंदो से

सारा जहाँ उनका है अपना
कोई नहीं है सीमा बंधन
उन्होंनें तय किया है कैसे
पूछा नहीं परिंदो से

नाम दिए हैं हमने उनके
नहीं पराया उनका कोई
हिल-मिलकर रहते हैं कैसे
पूछा नहीं परिंदो से

अल-सवेरे कलरव करते
शाम ढले घर को आते
घड़ी नहीं है, कैसे करते
पूछा नहीं परिंदो से

धूप कभी तो छांव कभी है
एक सरीखे घाव नहीं हैं
मिलकर सहते हैं कैसे
पूछा नहीं परिंदो से

कल का किया जुगाड़ नहीं था
आज-अभी मस्ती में रहते
कल का क्या, चहकते कैसे
पूछा नहीं परिंदो से

इस कोने से उस कोने तक
महा मौन की भाषा में
अभिव्यक्त करते हैं कैसे
पूछा नहीं परिंदो से

-के वाणिका 'दीप'

Wednesday, December 21, 2016

हाज़िर है तमाशा फिर से...कुँवर कुसुमेश

मिलने वाला है नए साल का तोहफा फिर से,
लोग कहते हैं कि हाज़िर है तमाशा फिर से।

पैरहन जिसने दिखावे के सिला रक्खे हैं ,
ओढ़ लेगा वो शराफ़त का लबादा फिर से।

डूब जायेंगे कई लोग हमेशा की तरह ,
लाँघ जायेगा कोई आग का दरिया फिर से।

तैरने वाला कभी हार नहीं मानेगा,
यानी तैराक तलातुम से लड़ेगा फिर से।

हम इसी दर्ज़ा "कुँवर" देंगे बधाई हरदम,
देखते जाइये क़ुदरत का करिश्मा फिर से।

-कुँवर कुसुमेश 

Tuesday, December 20, 2016

सच के साथ...........सुशील कुमार शर्मा


सच कहना
गुनाह तो नहीं है
रूठते लोग। 

मन में आंधी
घुमड़ते विचार
कब रुके हैं।  

सत्य बोलना
बहुत कठिन है
रहो अकेले।  

जब भी लिखा
कुछ न लिख पाया
सच के सिवा।  

मिट्टी का दीया
अंधेरे में प्रकाश
छोटी-सी आस।  

खिलाफ मेरे
सारा जहां खड़ा है
साथ हो तुम   

-सुशील कुमार शर्मा

Monday, December 19, 2016

ए मौत मगर तेरा कोई यार नहीं है...........श्रद्धा जैन.


इक रोज़ कज़ा आएगी, इंकार नहीं है 
ए मौत मगर तेरा कोई यार नहीं है

खुशरंग घटा, फूल, परिंदे, नदी, बादल 
क़ुदरत की तरह कोई भी फनकार नहीं है

मेरी ही तरह डरता है वो ज़ात से अपनी 
मेरी ही तरह वो भी गुनहगार नहीं है

आँखों में बसा है मेरी इक ख्वाब पुराना 
जा नींद, मुझे आज तू दरकार नहीं है

हर गीत मेरा इक नई आशा की किरण सा 
हारे हुए लफ़्ज़ों का ये अम्बार नहीं है

- श्रद्धा जैन

Sunday, December 18, 2016

स्त्री की नाक..........रंजना जायसवाल










सिर्फ साँस लेने और सूँघने की इंद्रिय
या चेहरे की सुंदरता का
आधार
नहीं होती नाक
मनुष्य के गौरव और सम्मान का
प्रतीक भी है यह
नाकदार होना प्रतिष्ठा की बात है
भावाभिव्यक्ति में भी माहिर होती है नाक
क्रियापदों से मिलकर अनगिनत भाव
व्यक्त कर सकती है अकेली नाक
चढ़े या फूले,तो क्रोध प्रकट करे 
सिकुड़े तो नफरत
इसे घिसे या रगड़े तो मिन्नत करें
पकड़ ली जाए,तो हो जाएँ अशक्त
रख ली जाए,तो इज्ज्त बचे
काट ली जाए तो इज्जत चली जाए
छेदे या दम करे तो परेशान हो
चने चबाए या सुपाड़ी तोड़े तो और भी परेशान
मक्खी ना बैठने दे,तो सावधान कहलाए
गुस्सा बैठा ले तो गुस्सैल
और दीया बालकर आए तो जीत मनाए 
कहाँ तक गिनवाएँ नाक की महिमा
आप उसकी सीध में जा सकते हैं
तो उस तक खा सकते हैं
पर नाक का सबसे सार्थक पर्याय है इज्जत |
स्त्री का नाक से जन्मजात रिश्ता होता है
वह कभी पिता की नाक होती है
तो कभी पति की
दोनों कुलों,परिवार-समाज,देश सभी की
नाक उसी पर टिकी होती है
उसकी हर गतिविधि नाक के
दायरे के अंदर ही होती है
नाक की चर्चा सुनकर ही वह बड़ी होती है
और सारी उम्र उसकी चिंता में गुजार देती है
जरूरी नहीं होता सिर्फ यह
कि ठीक-ठाक हो उसका नाक-नक्शा
अनगिनत नाकों की जिम्मेदारी भी होती है उस पर
नाकों का भारी बोझ लादे रहती है वह हरदम
अपनी कोमल पीठ पर
कभी हँस भी देती है जोर से तो
सिकुड़ने लगती है कई नाक
कई नाकें अपने कटने के डर से चिल्ला उठती हैं|
पुरूष की नाक स्त्री की नाक से ज्यादा लम्बी होती है
इसलिए उसके कटने का खतरा उसे सताता रहता है
स्त्री उसकी बात ना माने,उसके सांचे में ना ढले
खुद पर गर्व करे,आगे बढ़े,उससे काबिल हो जाए
या अपनी पसंद से प्रेम करे
तो कटी लगती है उसे अपनी नाक
बदले में वह भी काटने को
आतुर हो जाता है स्त्री की नाक
तीनों लोक में सबसे सुंदर स्त्री की नाक
त्रेतायुग में काटी गई कि वह करना चाहती थी
स्वतंत्र प्रेम
और इक्कीसवीं सदी में इसलिए काटी गई
कि उसने भी अपनी मर्जी जीनी चाही
सोचती हूँ अनगिनत नाकों की सुरक्षा करने वाली
स्त्री की जब काट दी जाती है नाक
दुनिया भर की नाकों को क्या शर्म नहीं आती ? 

-रंजना जायसवाल

- प्रस्तुतिः वसुन्धरा पाण्डेय


Saturday, December 17, 2016

बेटी............डॉ. ऋचा सत्यार्थी



प्यार भरा 
एक गीत है बेटी 
जीवन का 
संगीत है बेटी....

बेटी जैसे 
शीतल बयार 
बेटी जैसे 
रिमझिम फुहार 
जो महककाए 
घर का आंगन 
बेटी है 
वो खिली बहार 
एक सुहाना 
मौसम जैसे 
ऐसे मन का 
मीत है बेटी...

बेटी काजल 
बेटी कंगना 
बेटी मंदिर 
बेटी अंगना 
बेटी से 
संसार है अपना 
बेटी से ही 
हर इक सपना 
सात रंगों 
का इन्द्रधनुष 
जीवन भर की 
प्रीत है बेटी..

बेटी लक्ष्मी
बेटी सीता 
बेटी कुरान 
बेटी गीता 
बेटी है 
एक गौरव गाथा 
बेटी है तो 
सब जग जीता 
संस्कारों की 
डोर बंधी 
जैसे पावन 
रीत है बेटी....!

-डॉ. ऋचा सत्यार्थी
.......मधुरिमा से

Friday, December 16, 2016

दर्द इतना कहाँ से उठता है.........


दर्द इतना कहाँ से उठता है।
ये समझ लो की जाँ से उठता है।

सबसे आँखें चुरा रहा था मै
गम मगर अब जुबां से उठता है।

वो असर एक दिन दिखायेगा
शब्द जो भी जुबां से उठता है।

दिल गुनाहों से भर गया सबका
अब भरोसा जहाँ से उठता है।

आग लालच की खा गयी सबको
अब धुआँ हर मकाँ से उठता है।

याद किरदार फिर वही आया 
जो मेरी दास्तां से उठता है।

फिर कोई वस्वसा नहीं होता
न्याय जब नकदखाँ से उठता है।

मसअले प्यार से हुये थे हल
वो हुनर अब जहाँ से उठता है।

आग दिल की तो बुझ गई नादिर
बस धुआँ ही यहाँ से उठता है।

Thursday, December 15, 2016

रहने दो मन को फूल सा..........प्राण शर्मा

बेचारियों के मन सदा क्योंकर दुखाओ तुम
फूलों पे बैठी तितलियों को क्यों उड़ाओ तुम

रहने दो मन को फूल सा ऐ मेरे हमसफ़र
पत्थर की तरह क्यों उसे पत्थर बनाओ तुम

कड़वे फलों के पेड़ों की भी हैं ज़रूरतें
मीठे फलों के पेड़ों को चाहे लगाओ तुम

गंगा का साफ़ पानी है पीने के वास्ते
क्यों मैल अपने जिस्म की उसमें मिलाओ तुम

मन में बसाये बैठे हो बचपन से प्यार को
अब प्यार की जगह पे घृणा क्यों बसाओ तुम

वो झुक के तुमको रोज़ ही सिर पर बिठाता है
ऐ `प्राण` कभी तो उसे सिर पर बिठाओ तुम

-प्राण शर्मा